Sunday, September 25, 2016

Saved by the bill? Reform aims to fix India’s medical education

A fresh breeze is blowing in Delhi’s corridors and it could well turn into a squall. It is whooshing about, not in the ministries but in Niti Aayog, which has recently hired 50 professionals, educated at the world’s best universities. The first institution to experience the welcome showers will be medical colleges as part of an overhaul of the (MCI).
What is fresh, even revolutionary, in this reform is a new regulatory philosophy with a focus on outcomes — what the student is learning. The old thinking was fixated on inputs — student fees, teacher salaries, toilets — and neglected the quality of teaching and learning. If the reform succeeds, we shall have more and better-educated doctors. If this outcome-based approach infects the rest of India’s education, we shall indeed have a better-educated population.

The ills of medical education lie at the doors of a rotten MCI. It is synonymous with corruption and its former head has even spent time in jail. The MCI created an admission system based on illegal capitation fees; froze a teaching curriculum despite advances in medicine; created shortage of quality doctors, and devalued merit and ethics. The proposed bill tries to fix these ills. How well a student performs in a statutory national merit exam will now decide who gets into a college. What students learn will be measured in a common licentiate exit exam that will also decide the college’s ranking and its ability to attract students. Since rankings will be online, students and parents will be able to make an informed choice. Dodgy, poorly rated colleges will be forced to improve standards or face extinction. Passing the exit exam will be mandatory for a licence to practice and will be the entry ticket for post-graduate work.

Based on the world’s best practices, the draft bill does not want the state to micromanage student fees, teacher salaries, curriculum, and size of toilets. Instead, regulators will monitor and publicize how well the college performs in student learning. Once the transparent, merit-based admission system is in place, colleges will be freed from arbitrary controls on fees, salaries, and the expansion of seats. Up to 40% of the seats will be on full scholarship for poor but meritorious students. Freeing teacher salaries should attract ‘big name’ doctors to teaching, at least on a part-time basis. Freeing the curriculum will allow the best colleges to offer innovative courses.

The other problem is the supply of good colleges. Today 11 lakh students are chasing 55,000 seats in medical colleges. India is short by 30 lakh doctors. At the rate we are producing doctors, it will take 50 years to clear the backlog — a terrible, unacceptable sacrifice of two generations.

This unhappy state of affairs is the result of a socialist belief that only the state should provide education. Since the Indian state has never had enough money to do all that the socialists wanted, it has grudgingly accepted the entry of the private sector, but shackled it with the horrific controls of licence-permit-inspector raj. This has discouraged honest individuals from starting colleges but encouraged corrupt politicians to get into the act. Our attachment to state-run colleges is bizarre when private universities abroad are among the best in the world. By removing barriers to entry, the new bill expects a dramatic growth of quality medical colleges, which should, hopefully, solve the problem of the supply of doctors. In the end, I could find only two lacunae in the bill: (1) the lack of provision for village or barefoot doctors and (2) the absence of protection of patients against doctor malpractice.

Passing this new law will not be easy because doctors associated with the MCI are powerful and will fight any attempts to expand doctor supply. They will have the support of ageing socialists who still believe that only government should provide education.

Fortunately, there is rare unanimity in Parliament, judiciary and the executive for a drastic overhaul of MCI. The proposed bill, in fact, follows the spirit of the parliamentary standing committee’s recommendations. The bill itself is available for public consultation. If it succeeds in becoming law, its regulatory philosophy based on outcomes will create a potent precedent for regulating all types of education in India. This is exactly the sort of institutional reform that we had hoped for when Narendra Modi promised to usher in good governance and beat corruption.

Tuesday, August 23, 2016

जीएसटी का पारित होना असली राष्ट्रवाद

कुछ माह पहले मैं दिल्ली में एक आयोजन में गया था, जिसमें नफासत से वस्त्र पहने, वक्तृत्व में माहिर भारतीय और कुछ विदेशी मौजूद थे। वहां एक अलग से युवा ने प्रवेश किया। किसी ने पहचाना कि यह तो किसी हिंदी टेलीविजन से है। ऐसा लगा कि वह वहां ज्यादातर उपेक्षित ही रह गया, जब तक कि किसी ने उसे उकसा नहीं दिया। उसके बाद तो जेएनयू विवाद पर ऊंची आवाज में कर्कश बहस छिड़ गई। उसने हिंदू राष्ट्रवादी रुख का बहुत भावावेश के साथ बचाव किया, लेकिन उसे जल्दी ही शोर मचाकर चुप कर दिया गया। खुद को अपमानित महसूस कर वह जल्दी ही वहां से चला गया। उसके जाते ही ‘धर्मनिरपेक्ष-उदारवादियों’ ने राहत महसूस की, लेकिन इससे पहले उन्होंने ‘सनकी विचारों’ वाले ‘निम्नस्तरीय’ उस व्यक्ति पर जमकर गुस्सा उतारा।

मैं उसकी राष्ट्रवाद संबंधी दलीलों से सहमत नहीं था, लेकिन अपना दृष्टिकोण रखने के उसके अधिकार का मैंने पूरा बचाव किया। उसके साथ जो हुआ वह मुझे अच्छा नहीं लगा। बेशक, अल्पसंख्यकों के प्रति वह संकुचित मानसिकता, कट्‌टरपंथ दिखा रखा था, लेकिन वह भी तो सारी कमजोरियों के साथ एक मानव था। उसे उतनी अच्छी शिक्षा नहीं मिली। उसकी कमजोर अंग्रेजी ने सामाजिक स्तर पर उसकी स्थिति नाजुक बना दी थी। उसे सहानुभूति की बजाय खुद को महत्वपूर्ण समझने वाले उदारवादियों की ओर से दंभपूर्ण तिरस्कार िमला। यह वर्ग, पहचान की विविधता को तो प्रोत्साहित करता है, लेकिन विचारों की विविधता के प्रति असहिष्णु है।

पिछले दो वर्षों में यह दुखद विभाजन बढ़ा है, जिसकी अपेक्षा हमने प्रधानमंत्री मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के साथ चुने जाने के बाद नहीं की थी। मैं उदारवादी हूं और हिंदू राष्ट्रवादियों के मुस्लिम विरोधी पूर्वग्रहों से इत्तेफाक नहीं रखता। मैं गोमांस नहीं खाता, लेकिन किसी के खाने के अधिकार का पूरा बचाव करूंगा। दादरी में हिंसा से मैं व्यथित था और प्रधानमंत्री के देरी से प्रतिक्रिया देने पर विचलित हुआ। स्वामी आदित्यनाथ द्वारा अखलाक के परिवार को गोहत्या के आरोप में गिरफ्तार करने की अजीब मांग ने तो मुझे रोष से भर दिया। गुजरात में दलितों के खिलाफ गोरक्षकों की हिंसा की मैंने निंदा की। इस सबके बावजूद मेरे साथी उदारवादियों के अहंकार ने भी मुझे दुखी कर दिया। सहिष्णुता के नाम पर उन्होंने उन लोगों के साथ उतनी ही असहिष्णुता दिखाई, जिनके विचार उनसे भिन्न हैं। शायद यही वजह है कि उदारवाद देश में बढ़ नहीं रहा है।

हम धर्मनिरपेक्ष उदारवादी समान एलीट स्कूलों व यूनिवर्सिटी में जाते हैं, जहां पढ़ाने वाले उदारवादी और वामपंथी रुझान वाले होते हैं। किसी हिंदू राष्ट्रवादी के लिए एलीट कॉलेज में छात्र या शिक्षक के रूप में प्रवेश पाना कठिन ही होता है। संभव है कमजोर अंग्रेजी इसकी वजह हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उदारवादी एकाधिकार के लिए पक्षपात तो है (अजीब है कि आरक्षण के कारण दलित या ओबीसी के लिए एलीट रैंक में प्रवेश पाना तुलनात्मक रूप से आसान है)। यदि आप भी मेरी तरह मानते हैं कि हिंदुत्व विचारधारा सैद्धांतिक रूप से गलत जमीन पर टिकी है, तो हमें इसके समर्थकों को शीर्ष विश्वविद्यालयों में जाकर बहस में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। केवल इसी तरह भारत में वास्तविक कंजर्वेटिव बुद्धिजीवी पैदा होंगे, जिनकी दलीलें पुराणों से ली गई टेक्नोलॉजी फेंटसी की बजाय पुष्ट किए जा सकने वाले तथ्यों पर आधारित होंगी। उन्हें विद्रुप बनाकर पेश करने और उनके साथ हावी होकर पेश आने से हम उनके विद्वेष को और मजबूत करते हैं और उन्हें हिंदुत्व में और गहरे झोंक देते हैं। नतीजे में उदारवादी विचारधारा छोटे कुलीन वर्ग तक ही सीमित रह जाती है।

धर्मनिरपेक्ष उदारवादियों का अहंकार न सिर्फ नैतिक रूप से गलत है, यह खराब चुनाव रणनीति भी है। यदि कांग्रेस या वाम दल मतदाता को उदारवादी विचारधारा में लाना चाहते हैं, तो टेलीविजन के परदे पर हर रात प्रवक्ताओं की ओर से तिरस्कारपूर्ण बातों से वे सफल नहीं होंगे। उदारवादी अपना घोष वाक्य याद रखें, ‘अापकी बात से मैं सहमत नहीं हूं, लेकिन जान देकर भी मैं इसे कहने के अापके अधिकार की रक्षा करूंगा।’ इसकी बजाय वे ‘आपकी बात से मैं असहमत हूं इसलिए चुप बैठो, मूर्ख।’ जैसा व्यवहार करते हैं, जो लोगों को दूर करता है। उदारवादी आदर्श इतना कीमती है कि इसे किसी राजनीतिक दल या अभिमानी बुद्धिजीवियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यह दक्षिण बनाम वाम का भी मामला नहीं है। सारे भारतीयों को उदारवादी और बहुलतावादी भारत के विचार को अपनाना चाहिए।

पिछले एक साल में बाहर दुनिया में भी असहिष्णुता बढ़ी है। यह राष्ट्रवाद से जुड़ी है और बहुत नुकसान कर रही है। यह लोगों को विदेशियों के खिलाफ कर रही है, आव्रजकों के लिए सीमा बंद करने की पक्षधर और मुक्त व्यापार के खिलाफ है। यह विश्व को शांत व समृद्ध बनाने वाली 70 साल की शानदार विरासत पर पानी फेरने पर तुली हैै। भारत में इस राष्ट्रवाद ने लोगों को अपनी भारतीयता की बजाय हिंदू, मुस्लिम और दलित पहचान के प्रति जागरूक बनाया है।

राष्ट्रवाद के कारण ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर हुआ, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प व समर्थक इसी वजह से विदेशियों व आव्रजकों के खिलाफ बोल रहे हैं। वे चीन को नौकरिया छीनने वाला बताकर उससे आयात रोकना चाहते हैं। हम प्राय: राष्ट्रवाद को सकारात्मक रूप में लेते हैं, लेकिन यह न भूलें कि इसने दुनिया को बहुत नुकसान पहुंचाया है। 19वीं सदी में इसके कारण यूरोपीय देशों ने एशिया व अफ्रीका के भारत जैसे देशों को गुलाम बनाया। 20वीं सदी में दो विश्वयुद्ध हुए। हिटलर गंदे राष्ट्रवाद का सबसे नाटकीय उदाहरण है। उसे अार्यों की श्रेष्ठता का मुगालता था और यहूदियों को निम्न मानकर उसने गैस चैम्बरों में 80 लाख यहूदियों की हत्या की।

यदि हम वाकई सहिष्णु, उदारवादी भारतीय समाज चाहते हैं तो हमें एक-दूसरे को समान समझना होगा- चाहे हम हिंदू, मुस्लिम या दलित क्यों न हों। एक अच्छा राष्ट्रवादी अपने देश की महानता बताने के लिए नारे नहीं लगाता, उसमें एक शांतिपूर्ण आत्म-विश्वास होता है। उसे देश की ताकत व कमजोरियों का पता होता है। भारतीय राष्ट्रवाद का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण तो 2 अगस्त, बुधवार की ऐतिहासिक रात को नज़र आया जब सारे दलों ने असहमति परे रखकर भारतीय टैक्स इतिहास के सबसे बड़े सुधार के पक्ष में वोट दिया। यह ताकतवर व समृद्ध भारत बनाएगा और यह निर्धनतम भारतीय के लिए भी मददगार होगा।

Sunday, August 14, 2016

Independence Day quiz: Are you a patriot or a nationalist?

It was a rare afternoon in Delhi’s August. The rain had stopped and an occasional nimbus cloud punctuated the astonishingly blue sky. A quiet breeze sent me on a walk into Lodhi Gardens on the way to meet an old friend in Khan Market. Our conversation over chai was halting and uneasy and we kept returning to the ill-fated rise of nationalism in the world. We wished for a world with more patriots and less nationalists like Donald Trump. Both of us had grown up on this distinction, made by one of our school heroes, George Orwell. He wrote, “By ‘patriotism’ I mean devotion to a particular place and a particular way of life, which one believes to be the best in the world but has no wish to force on other people…Nationalism, on the other hand, is inseparable from the desire for power and prestige,” and (I might add) wishes to impose one’s ideas on others.

Tomorrow is the day of our independence, and a good time to reflect on Orwell’s words. The past year has challenged our old understanding of what it means to be Indian. I was born just before Independence when the air we breathed was the air of patriotism. India was born in the shadows of Hitler, Stalin, and Mao, and was created by saints (as Andre Malraux put it). Those saints taught us that our patriotism could only be Indian, not Hindu or Muslim — hence, Partition was such a tragedy. Compared to the nationalism of Hitler, Stalin and Mao, which brought killing and death, our patriots brought us freedom without shedding an ounce of blood.

Since Orwell’s time, we have tended to use both words, nationalism and patriotism, vaguely and interchangeably, and we forget that they reflect opposing ideas. Confusion between the two may have brought about the surprising exit of Britain from the European Union and has also marred America’s election campaign for the presidency. In India, a similar confusion resulted in Kanhaiya Kumar’s troubles in February at Jawaharlal Nehru University, followed by a muddled debate over sedition. Both patriots and nationalists wish for a successful India but the patriot wants all Indians to succeed, especially its minorities, while the nationalist is mainly concerned with the whole. A nationalist places his country over everything; a patriot is likely to choose justice over his country.

Indian patriots and nationalists were both happy a few weeks ago, on the historic Wednesday night of August 3 when the momentous goods and services tax passed in the Rajya Sabha. The nationalist was happy because it would make for a stronger, more prosperous, more powerful nation; the patriot was cheerful because it would also help the poorest Indian.

The nationalist tends to shout slogans to proclaim his country’s greatness; the patriot is quietly confident, aware of his nation’s strengths and weaknesses. In wanting to holler, the nationalist reflects insecurity, low self-esteem, even a feeling of inferiority; the patriot is comfortable in his skin. “Every nationalist is haunted by the belief that the past can be altered,” wrote Orwell. Donald Trump in America and the nationalists in Britain who voted to leave the European Union are both driven by the utopian vision of a pure past when they ruled the world and their countries were not beset with irritating immigrants. The Hindu nationalist also dreams of a pure Aryan past — he wants his history to prove the glory of ancient India and its later decline under Muslim rule; he seeks “a simple narrative of Hindus having been the original inhabitants of a land later known as British India and…the creation of a Hindu state is projected as a legitimate return to a rightful inheritance,” writes the historian, Romila Thapar, in a recent slim and elegant volume of essays, On Nationalism. Thus, nationalist history is driven by power and hatred for the Other.

You may have guessed — I am a patriot, not a nationalist. But I do feel sad that there is no meaningful dialogue between the two, and this is responsible for the terrible polarization in most democracies today. As for me, I cherish my country’s natural beauty, its man-made achievements, and its history. While I love my country, I don’t want that love to oppress others. I even wonder why my love has to stop at the border. In the end, I regard all wars as civil wars because we are first human beings and only second, citizens of nations.

Saturday, July 23, 2016

மனிதவள மேம்பாட்டு துறையில் இருந்து ஸ்மிருதி இரானியை நீக்கியது வரலாற்று நிகழ்வு?

‘பிளஸ் 2 பொதுத் தேர்வை மாணவர்கள் திருப்தியாக ஏன் எழுதவில்லை. விளக்கம் கொடுங்கள்’ என்று கேட்டு, 240 பள்ளி முதல்வர்களுக்கு கேந்திரிய வித்யாலயா சங்காத்தன் உத்தரவிட்டுள்ளது. நமது பள்ளிகளின் செயல்பாடுகள், மாணவர்களின் கற்றல் திறன் குறித்து பிரதமர் மோடி கவலை கொண்டுள்ளார். ஒருமுறை பேசும்போது, ‘‘மாணவர்கள் என்ன எதிர்பார்க் கிறார்களோ அதை வகுப்பறைகள் பிரதிபலிக்க வேண்டும். பெற்றோர்களும் தங்கள் குழந்தை களுக்கு எங்கு உதவி வேண்டும் என்பதை தெரிந்து வைத்திருக்க வேண்டும்’’ என்று பேசினார்.

இந்த விஷயமே ஸ்மிருதி இரானியை மனித வள மேம்பாட்டுத் துறை அமைச்சர் பதவியில் இருந்து நீக்கியதற்கு காரணமாக இருக்கலாம். இது இந்திய வரலாற்றில் மிக முக்கியமான நிகழ்வாக இருக்கும்.

பள்ளி அளவில் கல்வியின் தரம் குறித்து இந்திய அரசியல்வாதிகள் அக்கறை செலுத்துவது வழக்கத்துக்கு மாறானது. கல்வி என்பது மாநில அரசு சம்பந்தப்பட்டது என்றாலும், செயல்பாடுகளின் அடிப்படையில் மத்திய அமைச்சரை மாற்றியது, பல மாநிலங்களில் தூங்கிக் கொண்டிருக்கும் கல்வித் துறை அமைச்சகத்தை தட்டியெழுப்பி உள்ளது.

மிகப்பெரிய மாற்றம் என்பது ஸ்மிருதிக்குப் பதில் பிரகாஷ் ஜவடேகரை மனிதவள மேம்பாட்டுத் துறை அமைச்சராக நியமித்ததுதான். இந்தியாவை பொறுத்தவரை கல்வி அமைச்சகத்துக்கு திறமை யில்லாத அமைச்சர்கள் இருந்து வருவது துரதிருஷ்டவசமானது. அந்த வகையில் ஸ்மிருதியும் தவறான தேர்வுதான்.

தற்போது ஜவுளித் துறை அமைச்சராக ஸ்மிருதி நியமிக்கப்பட்டுள்ளார். மற்றவர்கள் நினைப்பது போல் இந்த மாற்றம் ஸ்மிருதிக்கு பதவி இறக்கம் அல்ல. இந்தியாவில் வேலைவாய்ப்பு களை அதிக எண்ணிக்கையில் உருவாக்க கூடிய மிகப்பெரிய வாய்ப்பு ஜவுளித் துறையில் உள்ளது. எனவே, புதிய கொள்கைகளை திறம்பட அமல்படுத்தினால், லட்சக்கணக்கான வேலைவாய்ப்புகளை ஸ்மிருதி யால் உருவாக்க முடியும். அதன்மூலம் மனிதவள மேம்பாட்டுத் துறையில் இழந்த அல்லது அவர் செய்த தவறுகளில் இருந்து மீண்டு பெயர் எடுக்கலாம்.

மனிதவள மேம்பாட்டுத் துறை ஜூனியர் அமைச்சர் பதவியில் இருந்து ராம் சங்கர் கத்தாரியாவும் நீக்கப்பட்டுள்ளார். இதுவும் சரியான நடவடிக்கைததான். கல்வியை காவிமயமாக்கும் முனைப்புடன் அவர் செயல்பட்டார். அத்துடன் முஸ்லிம்களுக்கு எதிராக சர்ச்சைக்குரிய கருத்துகளை அவ்வப்போது வெளியிட்டு வந்தார்.

அமைச்சரவை மாற்றத்தில் மிகப்பெரிய இழப்பு, ஜெயந்த் சின்காவை நிதியமைச்சகத்தில் இருந்து சிவில் விமானப் போக்குவரத்துத் துறைக்கு மாற்றியதுதான். முதலீட்டாளர்களிடம் நம்பிக் கையை ஏற்படுத்தினார். ரிசர்வ் வங்கியில் இருந்து ரகுராம் ராஜன் விலகியதன் மூலம், நம்பிக்கைக் குரிய 2 பேரை இப்போது இந்தியா இழந்துவிட்டது.

எனினும், அதிர்ஷ்டவசமாக உள்கட்டமைப்பு விஷயத்தில் செயல்திறன்மிக்க 3 பேரை மோடி வைத்திருக்கிறார். சாலை, நெடுஞ்சாலை, துறைமுகத் துறை அமைச்சர் நிதின் கட்கரி, நிலக்கரி, எரிசக்தி, சுரங்கத் துறை அமைச்சர் பியூஷ் கோயல் மற்றும் ரயில்வேயில் சுரேஷ் பிரபு ஆகிய 3 பேர் இருக்கின்றனர்.

சில ஆண்டுகளுக்கு முன்பு அமெரிக்க அதிபர் ஒபாமா தொலைக்காட்சியில் பேசும்போது, ‘‘சிறந்த ஆசிரியர்களுக்கும் சிறப்பில்லாத ஆசிரியர்களுக் கும் வேறுபாடு உள்ளது’’ என்றார். அமெரிக்காவில் மாணவர்கள் கற்றல் குறைபாட்டுடன் இருப்பதற்கு ஆசிரியர்கள்தான் காரணம் என்றார். அதுபோல் நாமும் சிறந்த ஆசிரியர்களை அங்கீகரிக்கவும், சிறப்பில்லாத ஆசிரியர்களை தண்டிக்கவும் வழிவகை காண வேண்டும்.

பள்ளிக் கல்வியில் உள்ள சிக்கல்களை பிரகாஷ் ஜவடேகர் கண்டறிந்துள்ளார். சர்வதேச மாணவர் மதிப்பீடு திட்டத்தின் கீழ் (பிஐஎஸ்ஏ) கடந்த 2011-ம் ஆண்டு வாசித்தல், அறிவியல் மற்றும் கணிதத்தில் நடத்தப்பட்ட தேர்வில் 74 பேரில் இந்திய குழந்தைகள் 73-வது இடத்தையே பிடித்துள்ளனர். இந்த அவல நிலையை கல்வி நிலையின் ஆண்டு அறிக்கை (ஏஎஸ்இஆர்) தொடர்ந்து உறுதிப்படுத்தி வருகிறது.

ஐந்தாம் வகுப்பு படிக்கும் மாணவர்களில் பாதிக்கும் குறைவானோர்தான் 2-ம் வகுப்பு புத்தகத்தில் இருந்து வாசிக்கும் திறனுடன் உள்ளனர் அல்லது சாதாரண சிறிய கணக்கை செய்கின்றனர் என்று அந்த அறிக்கை தெரிவித்துள்ளது. மேலும், இந்திய ஆசிரியர்களில் வெறும் 4 சதவீதம் பேர்தான் ஆசிரியர் தகுதி தேர்வில் (டெட்) வெற்றி பெற்றுள்ளனர் என்கிறது. உ.பி., பிஹார் போன்ற மாநிலங்களில் உள்ள ஆசிரியர்களில் 4-ல் 3 பேரால் 5-ம் வகுப்பு சதவீதத்தை கணக்கிடக் கூட செய்ய முடிவதில்லை.

இந்நிலையில், ஆசிரியர் குடும்பத்தில் இருந்து வந்துள்ளார் ஜவடேகர். இந்திய பெற்றோர் தங்கள் குழந்தைகளை அரசு பள்ளிகளில் சேர்க்காமல் தனியார் பள்ளிகளில் ஏன் சேர்க்கின்றனர் என்பதை ஜவடேகர் நன்கு புரிந்து வைத்துள்ளார்.

பள்ளிகளில் இலவச கல்வி கிடைத்தும், தாங்கள் கஷ்டப்பட்டு சம்பாதிக்கும் பணத்தை தனியார் பள்ளிகளுக்கு பெற்றோர் வழங்கும் நிலை ஏன்? இதற்கு நேர்மையாக பதில் அளிக்க வேண்டு மானால், 4 அரசு பள்ளி ஆசிரியர்களில் ஒருவர் சட்டவிரோதமாக, பள்ளிக்கு வருவதில்லை. பள்ளிக்கு வரும் இருவரில் ஒருவர் பாடம் நடத்து வதில்லை. அரசு பள்ளிகளை கைவிடுவதற்கு நீங்கள் பெற்றோர்களை குறை சொல்ல முடியுமா? தனியார் பள்ளிகள் பெரும்பாலானவை சிறப்பானதாகவும் இல்லை. ஆனால், குறைந்தப்பட்சம் ஆசிரியர்கள் இருக்கிறார்கள்.

கோடிக்கணக்கில் தொடக்கக் கல்விக்கு அரசு பணம் கொட்டப்படுகிறது. ஆனாலும் கல்வியின் தரம் உயரவில்லை. இது இந்தியாவில் உள்ள கல்வி அமைப்புகள் மீது கூறப்படும் மிகப்பெரிய குற்றச்சாட்டு. கல்வி அடிப்படை உரிமை சட்டத்தால் (ஆர்டிஇ) எந்த பலனும் ஏற்படவில்லை. அதற்கான காரணம் தெரிந்ததுதான். இந்தச் சட்டம் உள்ளீடுகளில் மட்டுமே கவனம் செலுத்துகிறது. பலனை பார்ப்பதில்லை.

வகுப்பறை அளவு, கழிவறைகள், விளையாட்டு மைதானங்களின் அளவு போன்ற உள்கட்டமைப்பு விஷயங்கள் மட்டுமே கவனத்தில் எடுத்துக் கொள்ளப்படுகின்றன. மாணவர்கள் என்ன கற்கின்றனர், கற்பித்தல் தரம் எப்படி இருக்கின்றது என்பதை பற்றி எல்லாம் அளவிட மாநிலங்களை இந்தச் சட்டம் அனுமதிப்பதில்லை.

கற்றல் தரத்தை நீங்கள் அளவிட முடியாத போது, ஆசிரியர்களை எப்படி பொறுப்பாளியாக்க முடியும்? உலகில் சிறந்த பள்ளிக் கல்வியை வழங்கும் நாடுகள் இதை உணர்ந்திருக்கின்றன. அதனால் ஆசிரியர்கள்தான் எல்லாமும் என்கின்றன. அதற்காக தேசிய அளவில் ஆசிரியர்களுக்கு மதிப்பீடுகளும் கடுமையான பயிற்சி திட்டங்களையும் செயல்படுத்துகின்றன.

‘சிறந்த ஆசிரியர்களாக இருப்பவர்கள் பிறவியிலேயே அப்படிப்பட்டவர்கள்’ என்று நம்புவதுதான் நமது தவறு. உண்மையில் போதிய பயிற்சியின் மூலம் யார் வேண்டுமானாலும் சிறந்த ஆசிரியர்களாக உருவாக முடியும். ஆனால், அந்த பயிற்சி தொடர்ந்து இருக்க வேண்டும், கடுமையாக இருக்க வேண்டும், ஆசிரியர் பணி காலம் முழுவதும் இருக்க வேண்டும்.

ஸ்மிருதியிடம் காணப்பட்ட குறைபாடுகள் ஜவடேகரிடம் இல்லை. பிரதமர் அலுவலகம், நிதி ஆயோக், டிஎஸ்ஆர் சுப்பிரமணியம் குழுவுடன் இணைந்து செயல்படுகிறார். இவர்கள் எல்லாம் சிறந்த யோசனைகளை அளிப்பவர்கள். எனினும் வரும் 3 ஆண்டுகளுக்குள் ஜவடேகர் ஏதாவது சாதிக்க வேண்டும் என்று நினைத்தால், மாணவர்களின் கற்றல் திறனை அளவிட்டு, அதை மேம்படுத்தும் விஷயம் ஒன்றில் மட்டும் அதிக கவனம் செலுத்த வேண்டும். அதைவிட ஜவடேகருக்கு மிக முக்கியமான இலக்காக எது இருக்க வேண்டும்? வரும் 2019-ம் ஆண்டுக்குள் 3-ம் வகுப்பிலேயே மாணவர்கள் நன்கு எழுதவும் படிக்கவும் கூடிய திறனுடன் இருக்கும் வகையில் மாற்றத்தை கொண்டு வரமுடியுமா?

இதைக் கேட்பதற்கு பகல் கனவாக தோன்றுகிறதா? அரசு தன்னார்வ தொண்டு நிறுவனம் ‘பிரதம்’ இந்த இலக்கை ஒரே ஆண்டில் ஏற்படுத்த முடியும் என்பதை 2 மாநிலங்களில் செய்து காட்டி இருக்கிறது!

Thursday, July 21, 2016

क्या शिक्षा के लिए यह ऐतिहासिक पल है?

केंद्रीय विद्यालय संगठन ने अपने 240 स्कूलों से 12वीं की परीक्षा में बच्चों के असंतोषजनक प्रदर्शन पर स्पष्टीकरण मांगा है। प्रधानमंत्री कुछ समय से हमारे स्कूलों के नतीजों से चिंतित हैं और अपने एक भाषण में उन्होंने यहां तक कहा है कि हर कक्षा में यह प्रदर्शित होना चाहिए कि वहां बच्चे से क्या सीखने की अपेक्षा है, ताकि पालकों को मालूम हो कि बच्चे को मदद की कहां जरूरत है। यह शायद स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाने का निर्णायक कारण रहा हो। वे खासतौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा पूछे गए प्रश्नों के प्रति अनुत्तरदायी रही हैं और इसकी कीमत उन्होंने चुकाई है। भारतीय इतिहास में यह ऐतिहासिक क्षण हो सकता है। स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता के लिए चिंता भारतीय राजनेताओं में असामान्य बात है। चाहे शिक्षा राज्यों का विषय हो, लेकिन प्रदर्शन के आधार पर मंत्री के बदले जाने से कई राज्यों के उनींदे और लापरवाह मंत्रीगण अचानक सक्रिय हो गए हैं।

जिसे मंत्रिमंडल का आम फेरबदल समझा जा रहा था वह चौकाने वाला साहसी कदम साबित हुआ। बड़े बदलाव के तहत मानव संसाधन विकास मंत्रालय में लड़ाकू ईरानी की जगह प्रकाश जावड़ेकर ने ली। भारत खराब गुणवत्ता वाले शिक्षा मंत्रियों के मामले में बदकिस्मत रहा है। ईरानी का चयन गलत था और हर किसी से झगड़ा मोल लेकर उन्होंने स्थिति सुधारने में कोई मदद नहीं की। उन्हें कपड़ा मंत्रालय भेजा गया है, जो कोई पदावनति नहीं है, जैसा हर कोई सोच रहा है। यह मंत्रालय रोजगार निर्मित करने का अकेला सबसे बड़ा अवसर है और यदि ईरानी तीन सप्ताह पहले घोषित महत्वाकांक्षी योजना लागू करती हैं तो वे लाखों नौकरियां पैदा कर अपनी प्रतिष्ठा को पुन: चमका सकती हैं, जो वे शिक्षा मंत्रालय में हर गलत चीज पर ध्यान केंद्रित कर गंवा बैठी हैं।

राज्यमंत्री रामशंकर कठेरिया को भी मानव संसाधन मंत्रालय से उचित ही हटाया गया है। वे खुलेआम शिक्षा के भगवाकरण की बातें करते थे और कई बार मुस्लिमों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दे चुके थे। फेरबदल में बड़ा नुकसान तो वित्त मंत्रालय से नागरीक उड्‌डयन मंत्रालय में जयंत सिन्हा का तबादला है। वे मंत्रालय में असाधरण पेशेवर अंदाज लाए और निवेशकों के लिए भरोसा पैदा किया था। राजन रिजर्व बैंक से विदा ले ही रहे हैं, इसके साथ भारत ने दो भरोसेमंद आवाजें खो दी हैं। सौभाग्य से मोदी के पास उच्च प्रदर्शन करने वाले वाले तीन मंत्री अब भी हैं- सड़क, राजमार्ग व बंदरगाहों के प्रभारी नितिन गडकरी, कोयला, उर्जा और खनन के प्रभारी पीयूष गोयल तथा रेलवे के सुरेश प्रभु। उन्होंने अपने मंत्रालय में दुर्लभ ऊर्जा पैदा की है। नौकरियां पैदा करने, ‘अच्छे दिन’ लाने में वे भारत की सबसे बड़ी उम्मीदें हैं।

कुछ साल पहले अमेरिका में एेसा ही नाटकीय क्षण आया था, जब राष्ट्रपति ओबामा ने ख्यात टीवी उद्‌बोधन में कहा था कि अच्छे और बुरे शिक्षकों में फर्क है। इस वक्तव्य के साथ उन्होंने शिक्षक संघों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था, जो अच्छे और बुरे शिक्षकों के बीच फर्क करने को तैयार नहीं थे। इस तरह वे कुछ कमजोर क्षेत्रों में अमेरिकी छात्रों के खराब स्तर के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार थे। राष्ट्रपति ने जो बात स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखी, लेकिन वह सभी को साफ हो गई थी कि हमें अच्छे शिक्षकों को पुरस्कृत करने और खराब शिक्षकों को दंडित करने के तरीके खोजने होंगे।

अपने पद के कुछ हफ्तों में जावड़ेकर ने पता लगा लिया है कि भारतीय स्कूल संकट में हैं। भारतीय स्कूली बच्चे एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय टेस्ट में सिर्फ किर्गिजस्तान से ऊपर नीचे से दूसरे क्रम पर क्यों आए? 15 साल के किशोर 2011 में हुए पढ़ने, विज्ञान और जोड़-घटाव के प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टुडेंट्स असेसमेंट (पिसा) नामक टेस्ट में 74 में से 73 वें स्थान पर रहे। यूपीए सरकार ने भारत में पिसा पर प्रतिबंध लगाकर इसका जवाब दिया, जो बहुत ही धक्कादायक था। किंतु एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एसर) के जरिये इस निराशाजनक स्थिति की हर साल पुष्टि होती है। यह बताती है कि 5वी कक्षा के आधे से कम बच्चे दूसरी कक्षा की किताब पढ़ पाते हैं या साधारण जोड़-घटाव कर पाते हैं। सिर्फ चार फीसदी शिक्षक टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (टीईटी) पास कर पाएं। उप्र और बिहार के हर चार में से तीन शिक्षक पांचवीं कक्षा के प्रतिशत के सवाल नहीं कर पाते।

त्रासदी यह है कि प्राथमिक शिक्षा पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी शिक्षा की गुणवत्ता सुधर नहीं रही है। यह भारत के शिक्षा प्रतिष्ठान पर बहुत बड़ा दाग है। शिक्षा के अधिकार (आरटीई) की बड़ी सराहना हुई, लेकिन उसका कोई असर नहीं पड़ा है। कारण स्पष्ट है। आरटीई कानून को सिर्फ इनपुट की चिंता है, नतीजे की नहीं। यह आधारभूत ढांचे से ग्रसित है- कक्षा का आकार, टॉयलेट, खेल के मैदान का आकार, आदि। यह शासन को सुविधा नहीं देता कि वह बच्चे की शिक्षा व शिक्षक के पढ़ाने की गुणवत्ता का आकलन कर सके। यदि पढ़ाई का आकलन नहीं होगा तो शिक्षक जवाबदेह कैसे होंगे? दुनिया के श्रेष्ठतम शिक्षा संस्थानों ने माना है कि शिक्षा में शिक्षक ही सबकुछ है। उन्होंने राष्ट्रीय आकलन और शिक्षकों के प्रशिक्षण के सघन कार्यक्रम स्थापित किए हैं। हमने माना कि अच्छे शिक्षक पैदा होते हैं, जबकि सच तो यह है कि वे तैयार किए जाते हैं। पर्याप्त प्रशिक्षण के साथ कोई भी शिक्षक बन सकता है। किंतु प्रशिक्षण सतत, सघन और शिक्षक के पूरे कॅरिअर में चलते रहना चाहिए।

जावड़ेकर में ईरानी की खामियां नहीं हैं। वे अच्छे श्रोता हैं और पीएमओ, नीति आयोग व टीएसआर सुब्रह्मण्यम समिति के साथ मिलकर काम करेंगे। इन तीनों के पास कुछ अच्छे आइडिया हैं। लेकिन सरकार के शेष तीन वर्षों में उन्हें कुछ करके दिखाना है तो उन्हें बच्चों के सीखने का आकलन और उसे सुधारने पर पूरा ध्यान केंद्रित करना होगा। एक अच्छा नेता बहुत थोड़े महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करता है। वह उन पर रोज ध्यान देता है, निकट से प्रगति पर निगाह रखता है और उन्हें हासिल करने का रोमांच अनुभव करता है। श्रीमान जावड़ेकर, इससे अच्छा लक्ष्य क्या होगा कि 2019 तक तीसरी कक्षा तक हर भारतीय बच्चा पढ़ना-लिखना सीख जाए? यह दिवास्वप्न लगता है, लेकिन गैर-सरकारी संगठन ‘प्रथम’ ने दो राज्यों में दिखाया है कि यह दो साल में किया जा सकता है।

Sunday, July 10, 2016

Mr Javadekar, ask these three questions before you get to work

What was supposed to be a routine cabinet expansion this week turned into a bold shake-up. The big change is at the ministry of human resource development where the affable Prakash Javadekar has replaced the combative Smriti Irani. India has been unlucky in the poor quality of its education ministers. Irani was always the wrong choice and she did not help by picking a fight with everyone. She has moved to the textiles ministry, which is not a demotion as everyone thinks. Textiles represent India’s single biggest opportunity to create jobs, and if Irani implements the ambitious new policy announced three weeks ago, she could create lakhs of jobs and go to glory.

Ram Shankar Katheria has also been removed as junior HRD minister and rightly so. He spoke blatantly about saffronising education, and made repeated provocative comments against Muslims. The big loss in the reshuffle is Jayant Sinha’s transfer from finance to civil aviation. He brought unusual professional depth to the finance ministry and lent credibility for investors. With Raghuram Rajan leaving the Reserve Bank, India has lost two trustworthy voices. Fortunately, Modi has three high performers in charge of infrastructure — Nitin Gadkari in charge of roads, highways, ports; Piyush Goyal in coal, power and mines, and Suresh Prabhu in railways. They have brought rare energy to their jobs and represent India’s best hope for delivering jobs and ‘achhe din’.

Javadekar will discover that Indian schooling is in crisis if only he would ask three questions. First: why did India’s schoolchildren come second last in a respected international test, only ahead of Kyrgyzstan? Yes, Indian kids ranked 73 out of 74 in 2011 in a test of reading, science and arithmetic called PISA (Programme for International Student Assessment). The UPA government’s response to this shocking result was to ban PISA from India. But this dismal state of affairs is confirmed regularly by the Annual Status of Education Report (ASER). It shows that less than half the Class V students are able to read a paragraph from a Class II text or do a simple arithmetic sum. Only 4% of Indian teachers pass the Teacher Eligibility Test and three in four teachers in UP and Bihar cannot do percentage sums from a Class V text.

Second, Javadekar should ask: why do poor Indian parents remove their children from government schools, which are free, and send them to low-fee private schools? In urban areas, 50 to 70% of the children are in private schools. In rural areas, private-school attendance has risen from 19% to 29% in ten years. India now has the largest percentage of children in private schools. Parents must be desperate if they will spend their hard-earned income on what is available for free. The honest answer is that one out of four government teachers is absent illegally and one out of two present is found not to be teaching. Can you blame parents for abandoning government schools?

The third question: has the acclaimed Right to Education Act (RTE) improved this tragic situation? The answer is ‘No’. The RTE law is only concerned with inputs and not with outcomes. It is obsessed with infrastructure — class size, toilets, size of the playing field, etc — and does not measure what children are learning or the quality of teaching. If you don’t measure learning, how will teachers become accountable? The world’s best performing school systems have realized that the teacher is everything. They have instituted national assessments and rigorous programmes of teacher training. Our mistake is to believe that good teachers are born; in fact, they are made. Anyone with enough training can become a good teacher. But the training has to be continuous, rigorous, and throughout the teacher’s career.

Javadekar does not have some of Smriti Irani’s flaws. He is a good listener. He will work collaboratively with the PMO, Niti Aayog, and the TSR Subramanian Committee, all of whom have good ideas. In the end, a good leader sets a few — very few — ambitious goals, focuses on them daily, monitors progress closely, and experiences the thrill of achieving them. What would be a more worthwhile goal, Mr Javadekar, than to get every Indian child in Class III to be able to read and write by 2019? Sounds like a pipe dream — yet Pratham has shown in two states that it can be done in a year.

Sunday, June 12, 2016

Arrogant liberals are doing a big disservice to liberalism

A few months ago, I was at an attractive event in Delhi, surrounded by elegantly dressed, articulate Indians and a sprinkling of foreigners. Into this privileged gathering walked an awkward young man who someone recognized from Hindi television. He seemed to be lost and was mostly ignored until someone provoked him and there followed a loud, ugly argument over the JNU controversy. He put up a spirited defence of the Hindu nationalist position but he was quickly shouted down. He felt humiliated and left hurriedly. Once he was gone, the ‘secular-liberal’ gathering relaxed, but not before heaping condescension on this ‘low life’ with his ‘crazy ideas.’

I do not believe in sedition and I did not agree with any of the unwanted guest’s arguments. But I felt sorry for him and unhappy at the way he was treated. Of course, he was narrow-minded in his majoritarian approach to minorities; he was bigoted in the way he characterized Muslims. But he was also a vulnerable human being. He was less well-educated, and his weak English put him at a social disadvantage. Instead of empathy, he got supercilious scorn from a self-important liberal establishment that encourages diversity of identity but is intolerant of the diversity of ideas.

Over the past two years an unhappy divide has grown, something we did not expect when the nation elected Prime Minister Modi on the promise of ‘sabka saath, sabka vikas’. I am a classical (not a left) liberal and do not share the beliefs of Hindu nationalists. I do not eat beef but I will defend your right to eat it. I was disturbed by the violence at Dadri and upset that the Prime Minister reacted so late. A few weeks ago, I was outraged by Swami Adityanath’s bizarre demand for the arrest of Akhlaq’s family for cow slaughter. I deplore the violence of rightwing extremists around the world. Having said this, I am also saddened by the arrogance of my fellow liberals. In the name of tolerance they behave just as intolerantly towards those whose beliefs differ from theirs. They are just as guilty of tribal behaviour as their opponents. And this may be a reason why liberalism is not growing in our country.

The problem with secular liberals is that we go to the same elite schools and universities where the faculty is liberal and left-leaning. Some economics teachers may have shifted after the reforms from Marxism to market-based thinking, but culturally everyone is homogeneous. It is hard for a Hindu nationalist to get into an elite college, either as a student or a teacher. It may be because the candidate is less comfortable in English but there exists a clear bias in favour of liberal privilege. (It is easier, oddly enough, for a Dalit or an OBC to break into elite ranks because of reservations.) If you believe, as I do, that the Hindutva ideology is based on empirically false grounds, we must encourage its supporters to enter top universities and engage in free debate. Only thus will India produce genuine conservative intellectuals, whose arguments will be based on verifiable facts rather than on technological fantasies from the Puranas. By demonizing them or treating them condescendingly, we reinforce resentment and throw them deeper into Hindutva’s embrace. As a result, the liberal ideology remains confined to a small elite. And then we complain, “Why are there so few liberals in India?”

The arrogance of the secular liberal is not only morally wrong, it is bad electoral strategy. If the Congress or the Left parties want to convert the voter to a liberal ideology, they will not succeed by the sort of contemptuous and dismissive talk spokespersons engage in on television screens night after night. Liberals need to remember their own creed: “I disapprove of what you say, but I will defend to the death your right to say it.” Instead, they practise: “I disapprove of what you say; so shut up, you idiot.” This sort of behaviour drives people away. The liberal ideal is too precious to become the preserve of a political party or of sanctimonious intellectuals. It is also not an issue of the Right versus the Left — all Indians must embrace the liberal idea of a plural India that protects minorities. But we shall only win the heads and hearts of people with humility and by example.