Saturday, May 23, 2015

बेहतरी के बीच बेचैनी

राजनीति अल्पअवधि की चीज है, जबकि अर्थशास्त्र दीर्घकालिक। दोनों का झुकाव एक ही लक्ष्य की तरफ होता है, लेकिन तात्कालिक तौर पर दोनों विपरीत दिशा में काम करते हैं। इस बेमेल स्वभाव के कारण अधिकांश लोग निराश होते हैं।

अपनी सरकार की प्रथम वर्षगांठ पर यही बात प्रधानमंत्री मोदी के लिए समस्या भी है। हालांकि मोदी का रिकॉर्ड अच्छा है, लेकिन वह अपने समर्थकों की असाधारण अपेक्षाओं को नियंत्रित कर पाने में असफल रहे हैं। कुछ मुख्य प्राथमिकताओं को पूरा न कर पाने के कारण उनकी क्रियान्वयन क्षमता पर भी सवाल खड़े हुए हैं। संघ परिवार लगातार सरकार के समक्ष अड़चनें पैदा करता रहा है, लेकिन एक बड़े आश्चर्य की बात यही है कि मोदी अब व्यावहारिक हो चुके हैं और तीव्र व साहसिक सुधारों के बजाय क्रमिक आधुनिककर्ता के रूप में दिख रहे हैं। राजनीतिक मध्य मार्ग के प्रति झुकाव के कारण उन्होंने अपने अधिकांश समर्थक समूहों को नाखुश किया है।

एक वर्ष पहले की अपेक्षा अर्थव्यवस्था बेहतर हालत में है, लेकिन अभी भी यह अपनी वास्तविक क्षमता से दूर है। जीडीपी विकास में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और अगले वर्ष तक भारत चीन को पछाड़कर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन जाएगा। महंगाई 18 महीने पहले की तुलना में इस समय आधी है। पिछले एक वर्ष से रुपया सर्वाधिक स्थिर मुद्रा है।

सरकारी वित्त की स्थिति बेहतर है। राजकोषीय और चालू खाते का घाटा नियंत्रण में है और 1991-92 की तुलना में पूंजी का प्रवाह सर्वाधिक है। बीमा और रक्षा क्षेत्र को अपेक्षाकृत उदार किया गया है और डीजल को विनियंत्रित कर दिया गया है। कोयला उत्पादन 8.3 फीसद बढ़ा है, जो पिछले 23 वर्षो में सर्वाधिक है। इससे कई बिजली संयत्रों को फिर से शुरू किया जा सका है। परियोजनाओं की स्वीकृति में व्याप्त अपंगता खत्म हुई है। आम बजट और रेलवे बजट, दोनों ही नए सिरे से निवेश उन्मुख हैं। पिछले 12 महीनों में घोटाले की एक भी घटना नहीं हुई है।

इससे उम्मीद जगी है कि भारत में बड़े घोटालों का समय खत्म हो गया है। पारदर्शी तरीके से कोयले और स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई। ऑनलाइन आवेदन और स्वीकृतियां दी जा रही है, जिससे रिश्वतखोरी की संभावना कम होती है। आज दुनिया में भारत की साख और स्थिति बेहतर हुई है। व्यक्तिगत कूटनीति के लिए मोदी को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। नेपाल और यमन में चलाए गए आपदा अभियान राहतकारी रहे हैं। इस ठोस रिकॉर्ड को देखते हुए आखिर कुछ लोग असहज क्यों हैं?

जब आप खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के दौर से वापस निकलते हैं तो स्थिति को सुधारने में समय लगता है। उपभोक्ता मांग अभी भी कमजोर है, कंपनियों के परिणाम ज्यादा अच्छे नहीं हैं, जिस कारण रोजगार सृजन भी कमजोर है। कृषि के लिए यह एक खराब वर्ष रहा और एक कमजोर मंत्री मददगार साबित नहीं हुआ। विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियों की गति धीमी रही, क्योंकि पिछली सरकार ने परियोजनाओं की स्वीकृति में देरी की, जिसके चलते इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों की बैलेंस शीट खराब हो गई। इन कंपनियों को बड़ी मात्र में बैंकों को पैसे का भुगतान करना पड़ा जिससे वे दिवालिया हो गईं।

अपने पिछले बजट में सरकार ने कंपनियों की वित्तीय स्थिति में सुधार होने तक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सीधे खर्च करने की बात कही थी। ऐसा होने के बावजूद रोजगार सृजन वापस पटरी पर लौटने में समय लगेगा। पिछली सरकार की नीतिगत अपंगता के चलते मतदाताओं ने मोदी की क्रियान्वयन क्षमता को देखते हुए उनका चुनाव किया था। हालांकि वह अभी इस दिशा में अपनी स्पष्ट छाप नहीं छोड़ सके हैं। हां, यह अवश्य है कि जनधन योजना बेहद सफल रही।

एक वर्ष पूर्व कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि प्रत्येक भारतीय परिवार के पास एक बैंक खाता हो सकता है। आधार कार्ड और मोबाइल फोन की वजह से अब गरीबों को सीधे नकदी हस्तांतरण हो सकेगा। यह एक ऐतिहासिक बदलाव है। इससे सब्सिडी में धांधली को रोका जा सकेगा। जनधन बैंक खाते से जुड़ी तीन योजनाओं को घोषित किया गया है जिनमें से एक बहुत कम कीमत पर दुर्घटना बीमा की सुविधा है, दूसरी जीवन बीमा है और तीसरी वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन योजना है। इनके लिए बहुत कम वार्षिक प्रीमियम देना होगा। महज 12 रुपये में दो लाख की दुर्घटना बीमा योजना, 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर पेंशन सुविधा का लाभ मिलेगा और 330 रुपये के वार्षिक प्रीमियम पर दो लाख रुपये की जीवन बीमा योजना सुविधा दी जाएगी।

यदि मोदी व्यापार में सहूलियत वाला माहौल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं तो उन्हें नौकरशाही की तमाम अनावश्यक प्रक्रियाओं को खत्म करना होगा। लालफीताशाही को खत्म करने की दिशा में भाजपा शासित राज्यों को पहल करनी होगी और अधिक प्रतिस्पर्धी तथा निवेश उन्मुख होना होगा। इसी तरह स्वच्छता अभियान की दिशा में भी उन्हें दूसरों को प्रेरित करना होगा कि किस तरह नगर-कस्बों की सफाई की जाए। संभवत: मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेस में सबसे बड़ी विफलता टैक्स विभाग है।

जहां मोदी निवेशकों को प्रेरित-प्रोत्साहित कर रहे हैं, वित्तमंत्री अरुण जेटली पूर्वानुमान योग्य और गैर प्रतिकूल माहौल निर्मित करने की बात रहे हैं वहीं यह आश्चर्यजनक है कि कर विभाग रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स (पिछली तिथि से कर लागू करना) को लेकर अभी भी अडिग है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशक अत्यधिक नाराज हैं और उन्होंने भारतीय शेयरों को बेचना शुरू कर दिया है, जिससे शेयर बाजार में तेज गिरावट की स्थिति बनी है। भारतीय करदाता भी परेशान हैं, क्योंकि निदरेष तथा ईमानदार करदाताओं को भी कर अधिकारी लगातार परेशान कर रहे हैं।

इससे भारतीय नौकरशाही के रवैये में कोई बदलाव नहीं होने की धारणा लोगों के मन-मस्तिष्क में बनी हुई है। 1व्यावसायियों का भी यह विश्वास टूटा है कि एक गुजराती होने के कारण वह व्यावसायिक माहौल के लिए प्रतिबद्ध हैं। आर्थिक समूहों के साथ आकांक्षी युवा भी साहसिक तरीके से बाजार सुधारों की दिशा में नहीं बढ़ने से निराश हैं, क्योंकि वह तेजी से रोजगार सृजन चाहते हैं। सेक्युलरवादी नाखुश हैं कि उन्होंने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंदूवादी बयान देने वालों को रोकने के लिए कुछ विशेष नहीं किया। उनके अपने समर्थक और संघ परिवार नाखुश हैं कि वह ईसाइयों और मुस्लिमों के प्रति अधिक नरम हैं।

मोदी की नजर आगामी चुनावों पर है। वह जानते हैं कि वर्तमान असंतोष गुजर जाएगा, क्योंकि राजनीति और अर्थशास्त्र अंत में मिल जाते हैं। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी अथवा केजरीवाल से बेहतर प्रदर्शन किया है, जो मई 2014 में भारतीय मतदाताओं के समक्ष दो अन्य विकल्प थे। साख की दृष्टि से उनकी सरकार ने बेहतर सफलता हासिल की है, लेकिन निश्चित रूप से यदि वह मुख्य आर्थिक प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहते तो और अधिक बेहतर कर सकते थे।

Sunday, May 17, 2015

One-year itch: Modi shift to political centre angers both right and left

Politics is a short game while economics is a long one. Both tend to converge in the end but in the interim they pull in opposite directions. Because of this mismatch, most of the people are invariably disappointed. This is Prime Minister Modi’s problem on the first anniversary of his government. Although his record is reasonably good, he has neither met the extraordinary expectations of his supporters nor followed through on key priorities. Surprisingly, he has turned out to be a pragmatic gradualist — by shifting towards the political centre, he has left all his constituencies unsatisfied.

The economy is in far better shape than a year ago, although nowhere near its full potential. GDP growth has turned around and India is set to surpass China next year to become the world’s fastest growing major economy. Inflation is down. Government finances are healthy — both fiscal and current account deficits are under control — and capital inflows have been the highest since ’91-92. Insurance and defence sectors have been liberalized and diesel decontrolled. Coal production has grown 8.3%, the highest in 23 years, allowing many power plants to restart. The paralysis afflicting project approvals is over. Both the general and railway budgets were refreshingly investment oriented.

There has been no corruption scandal in the past 12 months, raising the hope that the age of grand larceny may be over. Auctions for coal and spectrum were transparent. Applications and approvals are moving online where there is less scope for bribery. In addition, India’s standing in the world has improved thanks to Modi’s personal diplomacy, and recent actions to alleviate distress in Nepal and Yemen have reinforced this new stature.

Given this fair record, why is discontent brewing? When you are coming out of such a low economic ditch, it takes time for jobs to come back. When consumer demand is still weak, company results are poor; the producer is shy of investing and jobs prospects are bleak. It’s also been a bad year for agriculture and a weak minister hasn’t helped. Construction jobs are slow to come back because balance sheets of infrastructure companies were destroyed by approval paralysis of the past government.

Frustrated by that paralysis, voters brought in Modi because of his ability to act. But he has not given enough evidence of his execution skills. Yes, the Jan Dhan Yojana is a success. A year ago, no one imagined that every Indian family could aspire to a bank account. This is precisely what is happening. The stage is now set for a historic change in benefits delivery to the poor via cash transfers through Aadhar identity and mobile phones, which will cut subsidy fraud dramatically.

There are not enough implementation successes, however. Good leaders get into the messy details of execution. If Modi had focused on executing his ‘ease of doing business’ project, more bureaucratic processes would have been eliminated by now and the BJP-ruled states at least would have cut miles of red tape and become more competitive. Similarly, stronger implementation with municipalities by the Swachch Bharat Mission could have created some real models of success by now about how to clean up a town.

Perhaps, the biggest failure in the delivery of ‘minimum government, maximum governance’ is the tax department. While Modi has been wooing investors and FM Jaitley promising to create a predictable, non-adversarial environment, the tax department shockingly persists with unfair retrospective demands. The reality on the ground is that the innocent taxpayer continues to be harassed by tax officials. Hence, the image of an unreformed bureaucracy persists.

By moving towards the political centre, Modi seems to have displeased everyone. Businessmen think he is no longer as pro-business as he was in Gujarat. The cultural right is upset that he has turned out to be less sectarian, and even soft on Christians and Muslims. The economic right is disappointed that he has not implemented market reforms more boldly. His enemies on the left find that he has turned pro-poor, and stolen their fire. But with his eyes on 2019, he knows in his heart that votes reside in the political centre and he will win in the long run. The present discontent will also pass because politics and economics will converge in the end.

Sunday, April 19, 2015

Ten steps that can put the railways back on track

Once upon a time we used to proudly call Indian Railways the ‘nation’s lifeline’. Today, we are embarrassed by it. Every Indian had an impossibly romantic railway memory. Today these memories have faded as successive politicians have played havoc with a grand old institution. The root problem is that railways is a state monopoly, starved by politics of investment and technology, and prevented by a pernicious departmental structure from becoming a modern, vibrant enterprise. As a result, it is hard to get a ticket as capacity is short; service is shoddy, callous and unsafe, despite the railways being hopelessly over-manned.

Indian Railways remains one of the last state railway monopolies. Almost all democratic countries have broken their monopolies, and with spectacular results, disproving the old myth that the railway is a natural monopoly. Indians, too, have learned since 1991 that monopolies are bad. Before their eyes competition has created a telecom revolution. Who would have imagined that even the poorest would have a phone — India now has 99 crore telephones compared to 50 lakh in 1990. Competition has lowered prices, improved services, engendered innovation, and diminished corruption. Similar benefits have accrued in breaking other monopolies — for example, of Air India/Indian Airlines in air travel and Doordarshan in television.

Fortunately, there is real hope for the railways. Prime Minister Modi is determined to modernize it, and he has in Suresh Prabhu a capable, dynamic railway minister. What needs to be done is also clear from a series of expert committees, the latest being the Bibek Debroy committee, which has posted its interim report online on March 31 for comments from the public. Based on lessons learned from the reform of other railways and the world’s best practices, here are ten steps to restore the glory of a great institution.

One, create distance between the owner and the manager, as in all professional enterprises. The owner, in this case the ministry, should only lay down policy for the rail sector and give operating autonomy to those who run trains. Two, unbundle Indian Railways into two organizations — one responsible for the track and infrastructure and another to operate trains in competition with others. Each will have its own board with independent and executive directors. Three, establish an umpire or regulator to ensure fair and open access to the track, set access charges, establish tariffs, and ensure safety. Four, open up both freight and passenger trains to competition with Indian Railways. An independent regulator and track organization are essential to attract private competition.

Five, to be competitive, Indian Railways must focus only on core activity of running trains and divest all peripheral activities — running schools, hospitals, police forces, printing presses, bottling water — which fritter away resources and distract employees. Six, grant autonomy to production and construction units so that they can independently raise capital from the market and compete for business from railway companies in India and abroad. Seven, give general and divisional managers greater autonomy and accountability in all functions, including tendering, procurement, and finance.

Eight, move to modern, commercial accounting for better decision-making and raising funds from investors. Today, it is impossible to assess real profitability or real return on investment. Nine, let suburban and local passenger services which lose money be run as joint ventures with state governments, who must bear the cost of subsidy in the spirit of cooperative federalism. Ten, leverage land banks, airspace above stations, and other assets to raise capital with the help of investment banks to become a healthy, commercial enterprise.

In the ideal world, governments should govern and not run businesses. But given political realities, it is sensible not to privatize but create competition within the rail sector. Competition will lead to better, cleaner, safer services and happier customers. It will mean more motivated, accountable railway employees, insulated from politicians, and whose bonuses are linked to profitability, while pensions are protected by the state. And the nation will be saved the incalculable cost of transport shortages. The ball is now in Prabhu’s court. If there is anyone who can implement these ten steps, it is he.

Sunday, March 22, 2015

Land agitators forget even a farmer’s son needs a job

India elected Narendra Modi to control inflation, restrain corruption and bring back jobs. Inflation has come under control; there has been no corruption scandal in the past ten months; but jobs are nowhere in sight. Modi is banking on his ambitious ‘Make in India’ programme to revive manufacturing and deliver a million new jobs that are needed each month. But the problem is that manufacturing is precisely the sector that has historically let India down. Since 1991, India’s growth has been driven largely by services. Can Modi reverse this unhappy trend and usher in a genuine industrial revolution that has lifted 400 million people out of poverty in China?

Pessimists think not. With the coming of robotics, 3D printing, and digitally controlled lasers, manufacturing is so automated now that it is no longer possible for an unskilled farm labourer to aspire to a factory job. Moreover, manufacturing jobs, which are presently leaving China because of rising costs, are likely to go elsewhere — Southeast Asia, Mexico, and even Bangladesh. India remains unattractive because of its notorious red tape and poor infrastructure — made worse by UPA’s ‘tax terrorism’ and an impossible land acquisition law that has stopped land transactions. Thus, India has missed the bus.

Optimists, on the other hand, believe that even though industry is no longer the royal road to high income, India can benefit hugely from a resurgence in manufacturing. Our manufacturing share in GDP (16%) is so low — roughly half of other emerging economies — that India still has great potential to shift sizeable labour from farms to small, low-tech factories. Recent experience proves this. During the boom decade of 2002 to 2012, an impressive 5.1% workers per year moved to organized-sector jobs and delivered five times higher productivity. This revolution was reflected in all-round rise in labour wages, including rural wages. Because of rigid labour laws, growth in ‘informal’ jobs in the organized sector was greater, but at least informal jobs are better than no jobs.

I am with the optimists. Railways and defence sectors have suddenly emerged as new engines of industrialization in India, thanks to two highly capable men in Modi’s Cabinet. The first evidence came in Suresh Prabhu’s visionary railway budget, which was the best in memory. Manohar Parrikar’s vision of transforming India from the world’s largest arms importer to a more self-reliant military power has already begun to bring Indian companies and foreign technology providers to make defence equipment in India. A third engine is the revolution in e-commerce which holds the potential to create ten million jobs in the next three years, and might result in India skipping the supermarket stage, jumping from the kirana store to online retailing, much in the way many Indians skipped landlines and moved to cellphones.

The most important reason to believe that Modi will succeed is progress in the ‘ease of doing business’ campaign. The Centre and states are working closely to cut red tape to achieve the vision of one paper, one payment, one point of contact for the investor — all online. For imports and exports, the number of forms has been cut from nine to three. Maharashtra has decided to abolish half the approvals for starting a business. Punjab has taken power away from its departments and physically housed all approvals in a single office. But the best in class are Andhra and Telangana. An impressive e-biz portal is already up, tracking 14 different services/approvals. Rivalry between states will culminate this summer when the Prime Minister will announce statewise rankings in the ‘ease of doing business’ based on an extensive survey.

Never before in India’s history has there been so much urgency and determination to create jobs. The Budget has done its bit to kickstart investment in infrastructure. But vested interests are fighting back. So is the Opposition, which has taken to the streets against the land ordinance, pitting farmers versus industry, and forgetting two things: 1) Even the farmer’s son needs a job; 2) The ordinance is mainly trying to undo the red tape in the 2013 law — the hundred-odd signatures and 50 months required to buy an acre of land. If Modi eventually succeeds, two prizes are waiting at the end: India may finally experience an industrial revolution plus a demographic dividend.

Thursday, February 19, 2015

दिल्ली चुनाव को भूल जाएं मोदी

जिस दिन आम आदमी पार्टी दिल्ली में चौंकाने वाली जीत दर्ज कर रही थी, उसी दिन मैं पाकिस्तानी लेखक शाहिद नदीम के लाजवाब नाटक दारा का आनंद उठा रहा था। इसका मंचन हाल ही में लंदन के नेशनल थियेटर में किया गया था। तमाम स्कूली छात्र औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच चल रही खूनी जंग के बारे में जानते हैं, लेकिन यह नाटक केवल उत्ताराधिकार की लड़ाई तक ही सीमित नहीं है। इसमें दिखाया गया है कि भारत क्या था, क्या बन गया और क्या होना चाहिए था। यह आज की जनता को संबोधित था और इसमें नाखुश पाकिस्तान और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गंभीर नसीहत देता है। इसमें यह नसीहत भी है कि पिछले दिनों दिल्ली चुनाव में भाजपा को जो झटका लगा है भविष्य में वैसे झटकों से कैसे बचा जा सकता है। मानव इतिहास में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिले हैं। सबसे हृदयविदारक घटनाओं में से एक है जब मुगल बादशाह शाहजहां के बड़े बेटे और गद्दी के उत्ताराधिकारी दारा शिकोह का सिर कलम कर दिया गया था। तबसे भारतीयों को एक सवाल कचोटता रहता है कि अगर कट्टरपंथी और असहिष्णु औरंगजेब के बजाय दारा शिकोह भारत की गद्दी पर बैठता तो इतिहास की क्या दशा-दिशा होती। भारत के आखिरी वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन की कुख्यात गैरजिम्मेदारी के कारण 1947 में विभाजन का जो दंश झेलना पड़ा था, उसके बीज दारा शिकोह के जीवनकाल में ही रौप दिए गए थे।

दारा का संबंध अतीत से ही नहीं है। तमाम ऐतिहासिक नाटकों की यह भी आज के जमाने में प्रासंगिक है। जहां लंदनवासी सीरिया में आइएस के भयावह इस्लामिक उग्रवाद को लेकर भौचक थे, मैं मोहन भागवत और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करने की परियोजना को लेकर चिंतित था। जहां दारा की तरह मोदी भारत पर तमाम भारतीयों के लिए शासन करना चाहते हैं, वहीं मोहन भागवत भारत को बदनसीब पाकिस्तान में बदल देना चाहते हैं। संपूर्ण संघ परिवार को यह नाटक देखना चाहिए। कोई भी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सुनामी को नहीं समझ पा रहा है, और केजरीवाल तो सबसे कम। निश्चित तौर पर यह भारत के ढुलमुल लोकतंत्र की जीत है। किंतु असल मुद्दा यह है कि भारत के राजनेता इसकी किस तरह व्याख्या करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गलत सबक नहीं सीखने चाहिए। यह उनके विकास और सुधार एजेंडे के खिलाफ जनादेश नहीं है। उन्हें लोकलुभावन नीतियों से बचना होगा। असल में यह जनादेश संघ परिवार की विभाजनकारी नीतियों का खंडन है। आप की भारी-भरकम जीत बताती है कि दिल्ली के बहुत से मतदाता, जिन्होंने मई 2014 में मोदी के पक्ष में वोट दिया था, अब भाजपा से छिटक गए हैं। इनमें खासतौर पर अल्पसंख्यक मतदाता शामिल हैं। इसलिए मोदी को दारा पर ध्यान देने की जरूरत है।

दारा शिकोह एक अद्भुत और शानदार व्यक्तित्व थे। 1526 में मुगल शासन की शुरुआत से 1857 में इसके अंत तक जितने भी मुगल राजकुमार हुए, उनमें वह सबसे अलग और अनोखे थे। उनके अंदर दो महान पूर्वजों हुमायूं और अकबर के गुण थे। उनके जीवन का महान ध्येय था हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शांति और भाईचारा कायम करना। वह एक सूफी बुद्धिजीवी बने, जिसका मानना था कि हर किसी के लिए भगवान की तलाश समान है। उन्होंने अपना जीवन वेदांतिक और इस्लामिक अध्यात्म में समन्वय बैठाने में समर्पित कर दिया। वह मानते थे कि कुरान में अदृश्य किताब-किताब अल-मकनन, वास्तव में उपनिषद थे। उन्होंने संस्कृत सीखी और उपनिषद, भगवतगीता और योग वशिष्ठ का फारसी में अनुवाद किया। इसमें उन्होंने बनारस के पंडितों की मदद ली। अकबर और कबीर के पदचिह्नों पर चलते हुए उन्होंने सिख गुरु हर राय का अध्ययन किया। उन्हें अमृतसर में गोल्डन टेंपल की आधारशिला स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया गया। संभवत: वह भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का सबसे अच्छा उदाहरण हैं। वर्ह ंहदू और इस्लाम की रहस्य परंपराओं को एक दूसरे से जोड़ते रहे।

1657 में शाहजहां बीमार पड़ गए और औरंगजेब गद्दी के उत्ताराधिकारी अपने बड़े भाई दारा शिकोह के खिलाफ खड़ा हो गया। वह एक कट्टर मुसलमान था और दारा के विचारों को गलत मानता था। साथ ही वह अवसरवादी भी था। उसने सत्ता पर कब्जा जमाने के लिए दारा को रास्ते से हटाने का फैसला किया। उसने इस्लामिक मौलवियों और उलेमाओं की उच्चस्तरीय परिषद की बैठक बुलाई। इस परिषद में उसने अपनी मित्रमंडली और समर्थकों को भरा हुआ था। इस परिषद ने दारा शिकोह को शांति भंग करने और इस्लाम के प्रति गद्दारी का दोषी पाया और 30 अगस्त, 1659 की रात को मौत के घाट उतार दिया। अगर दारा इस सत्ता संघर्ष में जीत जाते तो भारत का भविष्य कुछ और ही होता। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुगल साम्राज्य इसलिए पतन के गर्त में गिरने लगा क्योंकि दारा शिकोह की मौत के समय औरंगजेब को महान सूफी संत और फारसी के प्रसिद्ध कवि सरमद ने श्राप दिया था।

सिंहासन पर बैठते ही औरंगजेब ने गैर-मुस्लिम भारत पर कड़ा शरिया शासन थोप दिया। विडंबना यह है कि अपने भाइयों, भतीजों और खुद के बच्चों के हत्यारे औरंगजेब को पाकिस्तान में मुसलमानों का नायक माना जाता है और दारा शिकोह को फुटनोट में ही जगह मिल पाई है। सौभाग्य से पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों में उदारवादी लेखकों ने दारा की अद्भुत विरासत को जिंदा रखा। कुछ वषरें के अंतराल पर उनके जीवन पर कोई न कोई किताब सामने आ जाती है। अगले सप्ताह 28 फरवरी को भारत सरकार बजट लाने जा रही है। हमें देखना होगा कि दिल्ली चुनावों में आप की जीत से मोदी ने क्या सबक लिए हैं। अगर वह इस जीत का कारण मुफ्त उपहार बांटना मानते हैं और सुधारों व ढांचागत विकास के कठिन रास्ते से हट जाते हैं तो यह शर्मनाक होगा। यही एकमात्र रास्ता है जिससे भारत में रोजगार पैदा होंगे और आर्थिक भविष्य सुनहरा होगा। अगर वह दिल्ली के चुनावों की पुनरावृत्तिनहीं चाहते तो उन्हे हिंदुओं के दक्षिणपंथी उभार पर अंकुश लगाना होगा। उन्हें औरंगजेब के कट्टरपंथ, असहिष्णु आचरण के बजाय दारा के विचारों से प्रेरणा लेनी होगी।

दिल्ली में गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी में आज भी दारा शिकोह द्वारा स्थापित किया गया पुस्तकालय मौजूद है। आप समय निकाल कर इसमें जाएं। अब यह भारतीय पुरातत्विक सर्वे द्वारा संचालित एक संग्रहालय के रूप में है। आप अपने दिमाग को दारा के विचारों की लौ प्रेरणा लेने दें कि धर्म सत्य, सौंदर्य, प्रेम और न्याय की शांतिपूर्ण तलाश है। जो सत्ता की हवस के लिए धर्म का इस्तेमाल करते हैं वे इतिहास के खलनायक हैं।

Wednesday, February 18, 2015

एक त्रासदी का मानवीय पहलू

पिछले छह हफ्तों से लेखक राजनेता शशि थरूर उस अजीब से चलन के शिकार हैं, जिसे मीडिया ट्रायल का नाम दिया जाता है। जब जिंदगी बुरा मोड़ लेती है तो मीडिया निष्ठुर भी हो सकता है। एक दिन तो यह सेलेब्रिटी को आसमान की बुलंदियों पर ले जाने में खुशी महसूस करता है और उतनी ही खुशी से यह अगले ही दिन उन्हें धड़ाम से नीचे लाकर पटक देता है। थरूर की पत्नी की त्रासदीपूर्ण मौत को एक साल से कुछ ज्यादा अरसा हो गया है। 1 जनवरी 2014 को सुनंदा ने अपने पति पर पाकिस्तानी पत्रकार के साथ अंतरंग संबंधों का आरोप लगाया था। जल्द ही दिल्ली के पांच सितारा होटल में उनकी मौत हो गई। कहा गया कि यह खुदकुशी थी। परंतु पिछले महीने पुलिस ने हत्या का मामला दायर किया और दिल्ली पुलिस के प्रमुख बीएस बस्सी ने कहा कि सुनंदा पुष्कर की मौत जहर से हुई।

2010 में विवाह के बाद से थरूर पति-पत्नी ‘ड्रीम कपल’ माने जाते थे। वे आक्रामक मीडिया के फोकस में अपनी ईर्ष्याजनक खुशनुमा जिंदगी जी रहे थे। सुनंदा आकर्षक थीं और शशि अच्छे वक्ता, करिश्माई अंदाज और बौद्धिक स्तर पर प्रेरक व्यक्तित्व वाले व्यक्ति हैं। परंपरागत भारतीय राजनेता की छवि में यह स्वागतयोग्य परिवर्तन था। आज दिल्ली पुलिस हत्या के मामले में शशि थरूर से पूछताछ कर रही है।

मानव की प्रवृत्ति त्रासदी के गहरे कारणों को तलाश करने और उन्हें समझने की कोशिश करने की बजाय पक्ष लेने की होती है। ‘किसने किया’ इस बारे में अटकलें लगाना निरर्थक है। वह पुलिस का काम है। अारोप लगाने की बजाय मानवीय तृष्णा (काम) की प्रकृति, इसकी अस्पष्ट सीमाएं और क्यों यह हम सबको एेसे संकट में डाल देती है, इसे समझना शायद उपयोगी होगा। खुद को त्रासदी के शिकार व्यक्ति की जगह रखकर शुरुआत करना ठीक होगा। ईसाई धर्म वाले पश्चिम में सृष्टि निर्मिति प्रकाश से शुरू हुई। बाइबल के अनुसार ईश्वर ने कहा- ‘प्रकाश हो जाए।’ प्राचीन भारतीय परंपरा कहती है कि प्रारंभ में तृष्णा (काम) थी। ऋग्वेद के अनुसार उस ‘एक’ के मन में ‘काम’ वह पहला बीज था, जिसकी ‘विशाल तृष्णा’ संसार की उत्पत्ति का कारण बनी। इस तरह ब्रह्मांड का जन्म आदिम जैविक ऊर्जा से हुआ। परंतु वह ‘एक’ को अकेलापन महसूस हुआ और उसने अपने शरीर को दो में विभाजित किया, जिससे स्त्री-पुरुष अस्तित्व में आए। उपनिषद में वर्णित यह आदिम विभाजन इशारा करता है कि मानव की मूल स्थिति अकेलेपन की है। हम दुनिया में अकेले आए थे और अकेले ही जाएंगे। अकेलापन दूर करने के लिए आदिम पुरुष ने आदिम स्री से संयोग किया और मानव जाति का प्रादुर्भाव हुआ। ‘काम’ की शारिरिक अंतरंगता हमारी एकाकीपन की भावनाअों पर काबू पाने में मददगार होती है।

चूंकि काम ही सबकुछ है- जीवन का स्रोत, क्रिया का मूल और सारी गतिविधियों का कारण, हमारे प्राचीन ऋषियों ने इसे ‘त्रिवर्ग’ में प्रतिष्ठित किया। जीवन के तीन लक्ष्य। इसके बाद भी भारतीय काम को लेकर दुविधा में ही रहे। वजह यह थी कि तृष्णा अंधी, उन्मत्त और इतनी आवेशयुक्त होती है कि उसे काबू में करना कठिन होता है। धोखाधड़ी, विश्वासघात, ईर्ष्या और अपराधबोध इसके चारों तरफ मंडराते रहते हैं। इस मामले में सुनंदा पुष्कर की ईर्ष्या के कारण यह त्रासदी हुई।

अपने मिश्रित स्वभाव के कारण ‘काम’ के अपने आशावादी और निराशावादी रहे हैं। आशावादी काम के दूसरे अर्थ ‘सुख’ पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे मानते हैं कि हमारे अल्प और रूखे जीवन में किसी प्रकार के सुख की अपेक्षा करने में कुछ गलत नहीं है। इसी विचार ने ‘कामसूत्र’ जैसी रचना, उद्‌दीपक कलाओं और प्रेम-काव्य को जन्म दिया, जो गुप्त साम्राज्य के दरबारों में खूब फले-फूले। निराशावादी प्राथमिक रूप से तपस्वी संन्यासी थे, जिनके लिए तृष्णा उनके आध्यात्मिक लक्ष्य में बाधक थी। भ्रम में पड़े संसारी लोग इन दो अतियों में मंडराते रहते और इनके उत्तर धर्म ग्रंथों में खोजते हैं। धर्मशास्त्रों ने काम के सकारात्मक गुणों को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही इसे एकल विवाह तक सीमित कर दिया, लेिकन स्त्री-पुरुषों ने एकल विवाह के अतिक्रमण करने के तरीके खोज लिए, जिससे अवैध प्रेम का उदय हुआ।

महाकाव्यों के कवियों ने काम और धर्म में अंतर्निहित विरोधाभास के कारण इसमें निहित त्रासदी की आशंका को देख लिया था। यदि धर्म दूसरों के प्रति हमारा कर्तव्य है तो काम स्वयं के प्रति कर्तव्य है। महाकाव्यों में अामतौर पर धर्म, काम को मात दे देता है, क्योंकि हम यह मानते हैं कि अपने आनंद के लिए दूसरों को आहत करना गलत है। पुरुष सत्ता और यौन संबंधों में असमानता के कारण (सुनंदा जैसी) महिला के लिए त्रासदी की ज्यादा संभावना है। महाभारत में द्रौपदी का चीरहरण पुरुष सत्ता का सबसे जाना-पहचाना प्रदर्शन है।

पुष्कर-थरूर मामले के पीछे नैतिकता की कहानी है। केवल थरूर को ही अपनी अंतरात्मा में उनके विवाह में काम धर्म के अपरिहार्य संघर्ष और जिन सीमाओं का उल्लंघन हुआ उनका सच मालूम होगा। खुद के प्रति कर्तव्य और दूसरों के प्रति कर्तव्य के बीच राह निकालना आसान नहीं है। आप चाहे शारिरिक रूप से इसका उल्लंघन भी करें, हममें से कई दिल ही दिल में तो ऐसा करते हैं।

मशहूर शख्सियतों के ऐसे सेक्स स्कैंडल मीडिया के लिए बिन मांगी मुराद पूरी होने जैसा है, लेकिन यह घटना इससे कहीं आगे मनुष्य के गिरते नैतिक स्तर की ओर इशारा करती है। ‘काम’ केवल सृजन का कारक और परिणाम ही नहीं है, यह हर अच्छे आैर बुरे कर्म की जड़ में है। एक ओर यह प्रेम, प्रसन्नता और सृजन का कारण है तो ईर्ष्या, क्रोध और हिंसा के पीछे भी यही है। क्या इन दोनों पहलुअों को अलग नहीं किया जा सकता? क्या दर्द के बिना खुशी मिलना संभव है? क्या हिंसा के बिना सृजन हो सकता है? इस कहानी में हमारे युवाओं पर मध्यवर्गीय नैतिकताएं थोपने के लिए हमेशा तैयार हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए राजनीतिक संदेश भी है। वे 19वीं सदी में विक्टोरियाकालीन इंग्लैंड के ईसाई मिशनरियों जैसा बर्ताव करते हैं। वे कामेच्छा की अनुमति नहीं देते या इसे पाप बताते हैं। इससे आम इंसान खुद को दोषी समझने लगता है। वे याद रखें कि हमारी शास्त्रीय परंपराओं में काम के सृजनात्मक पहलुओं को मान्यता हासिल है। विक्टोरियाइयों ने काम संबंधी इच्छाओं के लिए पाखंड का सहारा लिया, जबकि प्राचीन भारतीय इसके बारे में सहज रहे। आज इसका उल्टा हो रहा है। पश्चिमी समाज जहां इसके प्रति सहज और आधुनिक रवैया अपना चुका है, दक्षिणपंथी हिंदू समाज वेलेंटाइन डे जैसे आयोजनों का विरोध कर ज्यादा पाखंडी और असहनशील बनता जा रहा है।

Sunday, February 15, 2015

AAP staged PM must heed a Mughal prince

On the fateful day that the Aam Aadmi Party won a stunning victory in Delhi’s state election, I was captivated by the tragedy of ‘Dara’, a superb play by Pakistani writer Shaheed Nadeem, which opened recently at the National Theatre in London. Schoolchildren across India know all about the murderous rivalry between Aurangzeb and Dara Shikoh for the Mughal throne but this play is not only about a war of succession; it is about what India was, what it became, and what it might have been. It speaks to us today and offers some sobering advice both to unhappy Pakistan and to Prime Minister Modi, including how to avoid shocking reverses such as the one delivered by Delhi’s voters this week.

There are turning points in human history. One of the most poignant in India’s history was the beheading of the Mughal emperor Shah Jahan’s eldest son and heir-apparent, Dara Shikoh. Ever since then Indians have been haunted by the tantalizing question: what would have been the course of our history had Dara become emperor instead of his orthodox and intolerant younger brother, Aurangzeb? The seeds of the violent partition of India in 1947 — carried out with disgraceful lack of responsibility by the last viceroy of India, Lord Mountbatten — were planted by events in Dara’s life, which led to the greatest mass migration in human history.

‘Dara’ is not only about the past. Like all great historical plays, it is about our present. While Londoners were drawing parallels with Islamic extremism of the IS in Syria, I was thinking about Mohan Bhagwat and the Rashtriya Swayamsevak Sangh’s project to convert India into a ‘Hindu rashtra’. Whereas Modi, like Dara, wants to rule India for all Indians, Bhagwat wants to change India into ill-fated Pakistan. All of the RSS, indeed the entire Sangh Parivar, should see this play.

No one quite understands the tsunami unleashed in Delhi by AAP, least of all Arvind Kejriwal. It is certainly a victory for India’s fickle democracy. But the nub is how will politicians interpret it. Prime Minister Modi should not learn the wrong lessons. It is not a negative verdict on his development and reform agenda — he should resist the temptation to turn populist. Instead, it is a rejection of the Sangh Parivar’s divisive politics. The magnitude of AAP’s victory suggests that many Delhi voters (especially the minorities), who had voted for Modi in May, deserted the BJP now. Hence, Modi needs to heed Dara.

Dara Shikoh (1615-1659) was a gentle Sufi intellectual, who believed that the search for God is the same for everyone and devoted his life to synthesizing Vedantic and Islamic spirituality. Thinking that the ‘hidden book’ in the Quran, ‘Kitab al-Maknun’, is in fact the Upanishads, he learned Sanskrit and translated the Upanishads, Bhagavad Gita, and Yoga Vasishtha into Persian with the help of the pundits of Banaras. Following in Akbar’s footsteps, he cultivated the Sikh guru, Har Rai, and was invited to lay the foundation stone of the Golden Temple in Amritsar. All this did not go well with the orthodox bigot Aurangzeb, who declared Dara a threat to public peace and a traitor to Islam. And so, Dara was put to death and Aurangzeb succeeded to the throne to establish a harsh Sharia rule over an overwhelmingly non-Muslim India. Ironically, today it is Aurangzeb — the killer of his brothers, nephews, and his own children — who is a Muslim hero in Pakistani history while Dara has been reduced to a footnote. Fortunately, liberal writers both in Pakistan and India keep his wonderful legacy alive by coming up with a new play or a book on his life every few years.

In a couple of weeks the government will announce its budget and we shall find out the sort of lessons that Modi has drawn from AAP’s victory. It would be a shame if he saw it as a victory for giveaways and handouts, and backs off from the difficult path of reforms and infrastructure building — the only sure way to create jobs and secure India’s economic future. If he does not want another repeat of what happened in Delhi, he must muzzle the Hindu right, teaching it not to emulate the intolerant, fanatical Aurangzeb but to be inspired by Dara’s idea of India.