Saturday, November 22, 2014

मुक्त बाजार का मंत्र

बहुत से भारतीयों की धारणा अभी भी यही है कि बाजार धनी लोगों को और अधिक धनी तथा गरीबों को और अधिक गरीब बनाता है तथा यह भ्रष्टाचार एवं क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविकता यही है कि पिछले दो दशकों में व्यापक तौर पर समृद्धि बढ़ी है और तकरीबन 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। बावजूद इसके लोग अभी भी बाजार पर अविश्वास करते हैं। आंशिक तौर पर इसके लिए आर्थिक सुधारकों को दोष दिया जा सकता है, जो प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं अथवा धारणा को ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर की तरह आम लोगों को नहीं बता सके। सौभाग्य से हमारे पास अब नरेंद्र मोदी जैसा श्रेष्ठ सेल्समैन उपलब्ध है जो हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बदलने में समर्थ है। कुछ सप्ताह पूर्व जब सरकार ने डीजल के दामों को विनियंत्रित किया तो मोदी ने यह बताने का मौका खो दिया कि क्यों प्रतिस्पर्धी बाजार अधिक बेहतर है जो कि राजनेताओं के बजाय बाजार द्वारा निर्धारित होता है। उन्हें लोगों को याद दिलाना चाहिए कि 1955 से 1991 के बीच समाजवादी अर्थव्यवस्था वाले अंधकारपूर्ण वर्षों, जिसे हम लाइसेंस राज के रूप में याद करते हैं, के समय हमारा जीवन नियंत्रित कीमतों द्वारा प्रभावित होता था।

राजनीतिक तौर पर निर्धारित की गई कीमतें उत्पादकों को उनकी लागत निकालने की अनुमति नहीं देती थीं, जिससे अभाव की स्थिति बनी रहती थी और कालाबाजारी को बढ़ावा मिलता था। मुझे अभी भी याद है कि मेरा पारिवारिक घर वर्षों तक अधूरा रहा, क्योंकि मेरे पिता सीमेंट की कुछ अतिरिक्त बोरियों के लिए रिश्वत देने को तैयार नहीं हुए। इस राजनीतिक मूल्य व्यवस्था के कारण 1989 में शक्तिशाली सोवियत संघ भी ढह गया। कम्युनिस्ट सरकार का सभी फैक्टियों और उत्पादन के अन्य साधनों पर स्वामित्व था। क्या उत्पादन किया जाना है, कितना उत्पादन होना है और कीमतें क्या होंगी, यह सभी कुछ सोवियत संघ के नौकरशाह तय करते थे, न कि बाजार। इसने लोगों को बर्बाद करने का काम किया। रूस की दुर्गति को देखते हुए दुनिया ने यही सीखा कि सरकार का काम बिजनेस नहीं है और उसे वृहद आर्थिक नीतियों के मामले में न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए। भ्रष्टाचार कीमतों में हेरफेर का अनिवार्य परिणाम है। इसके कारण डीजल में केरोसिन की मिलावट को बढ़ावा मिला। इस बारे में पूर्व सरकारी तेल समन्वय समिति ने एक चौंकाने वाला आंकड़े पेश करते हुए तकरीबन 40,000 करोड़ रुपये के घोटाले का अनुमान व्यक्त किया। जांच में यह बात भी सामने आई कि इस रैकेट का खुलासा करने वाले तमाम मुखबिरों को मौत के घाट उतार दिया गया। खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लोगों को एक रुपये प्रति किलो अनाज मुहैया कराने के लिए राष्ट्र को वास्तव में 3.65 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि आधा अनाज खराब हो जाता है, जिससे राष्ट्र को प्रति वर्ष 50,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है।

बिजली के मामले में भी चोरी कीमत नियंत्रण का स्वाभाविक परिणाम है। इससे राज्य बिजली बोर्डों को वित्तीय नुकसान होता है। रेलवे को दूसरी श्रेणी के प्रति टिकट पर हर किलोमीटर के हिसाब से 24 पैसे का नुकसान होता है। यह तब है जबकि कुछ महीने पहले ही रेल किरायों में 15 फीसद की बढ़ोतरी की गई है। रेलवे को यात्री किराये से 26000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यात्री किराये में होने वाले घाटे की भरपाई मॉल भाड़े में बढ़ोतरी से की जाती है। यही मुख्य वजह है जिस कारण भारतीय रेल अपना आधुनिकीकरण नहीं कर पा रही है और शेष दुनिया की तुलना में भारत पीछे है। मोदी लोगों को समझाएं कि एक दक्ष और भ्रष्टाचारमुक्त अर्थव्यवस्था राजनेताओं को कीमतें निर्धारित करने की अनुमति नहीं देती। इससे उन्हें लोगों को यह समझाने में भी मदद मिलेगी कि जन धन योजना वाले खातों में नकदी धन हस्तांतरण बेहतर है और इस तरह गैस सिलेंडरों पर मिलने वाली सब्सिडी, पीडीएस खाद्यान्न और बिजली आदि के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भ्रष्टाचार घटेगा।

भ्रष्टाचार रोकने के मामले में लोकपाल के बजाय बाजार अधिक बेहतर काम कर सकता है। इस बात को अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे नहीं समझ सके। डीजल की कीमतों को विनियंत्रित करने के कुछ सप्ताह बाद ही सरकार ने कोयला खनन के लिए प्रतिस्पर्धी निविदा की घोषणा की। यह एक अच्छा निर्णय है। यह खुली निविदा उन्हीं तक सीमित है जो कोयले का उपयोग करते हैं, जैसे कि बिजली कंपनियां। इससे राज्यों को कई गुना अधिक राजस्व अर्जित होगा और कोयला बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी होगा। इससे कोल इंडिया का एकाधिकार खत्म होगा, जो कि एक प्रमुख समस्या बन चुका है। एयरलाइंस, टेलीफोन और टेलीविजन में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने की जरूरत है ताकि विकल्पों की उपलब्धता बढ़े और अधिक स्वतंत्रता कायम हो। एक अन्य हास्यास्पद बात यह है कि भारतीय सोचते हैं कि वे अपने गौरवमयी लोकतंत्र के कारण आजाद हैं, लेकिन आर्थिक तौर पर वे अभी भी पराधीन हैं। मोदी बार-बार कहते हैं कि सरकार का काम बिजनेस नहीं शासन संचालन है, लेकिन वह अपने कड़े निर्णयों का प्रचार नहीं कर सकते, जो आगामी कुछ महीनों में अवश्यंभावी हैं। उन्हें समझना होगा कि सब्सिडी, मूल्य नियंत्रण और सरकारी एकाधिकार से विकृति पैदा हो रही है और इससे जरूरतमंद आम लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। बाजार प्रतिस्पर्धा से कीमतें नियंत्रित होंगी, उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर होगी और आम आदमी की आजादी बढ़ेगी। दुनिया भर में उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि बिजनेस करने की स्वतंत्रता का उल्टा संबंध भ्रष्टाचार सूचकांक से है। इसका आशय यही है कि सर्वाधिक भ्रष्ट देश वह हैं जहां सरकारें बिजनेस पर नियंत्रण रखती हैं अथवा बाजार पर उनका बहुत अधिक हस्तक्षेप है। 2011 में दुनिया के 10 में से 7 सबसे कम भ्रष्ट देश बिजनेस फ्रीडम वाले देशों की सूची में शीर्ष 10 में शामिल थे। इनमें न्यूजीलैंड, सिंगापुर, डेनमार्क, कनाडा, स्वीडन और फिनलैंड शामिल हैं। 10 सर्वाधिक भ्रष्ट देश इस सूची में सबसे निचले पायदान पर हैं। भारत को इसमें बहुत ही खराब 167वां स्थान मिला और भ्रष्टाचार सूचकांक में भी भारत 95वें स्थान पर है।

स्कैंडिनेवियाई देशों जहां से भारत ने लोकपाल की धारणा ली है, में सर्वाधिक बिजनेस स्वतंत्रता है और वे सबसे कम भ्रष्ट हैं। बावजूद इसके भारतीय सोचते हैं कि वे अपने गौरवपूर्ण लोकतंत्र के कारण आजाद हैं। अंत में प्रधानमंत्री मोदी का आकलन रोजगार निर्माण, महंगाई पर नियंत्रण और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने से होगा। बाजार व्यवस्था पूर्ण नहीं है, लेकिन किसी भी अन्य विकल्प से बेहतर है। यदि मोदी हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बदलने में कामयाब हुए तो अभिलाषी भारत समाजवादी पाखंड की छाया से अंतत: मुक्त हो सकेगा और बाजारवादी व्यवस्था पर भरोसे की शुरुआत होगी।

Sunday, November 02, 2014

Can our best salesman sell us the free market?

Too many Indians still believe that the market makes “the rich richer and the poor poorer” and leads to corruption and crony capitalism. This is false, of course. Despite the market having generated broad-spread prosperity over two decades — lifting 250 million poor above the poverty line — people still distrust the market and the nation continues to reform by stealth. The blame lies partly with our reformers who have not ‘sold’ the competitive market as Margaret Thatcher did in Britain. But fortunately, we now have in Narendra Modi an outstanding salesman of ideas who could transform the master narrative of our political economy.

When the government decontrolled the price of diesel two weeks ago, Modi lost the opportunity to explain why the competitive market is far better at discovering prices than politicians. He could have reminded people that during our socialist licence raj, price controls pervaded our lives. Political prices did not allow producers to recover costs and this led to scarcities, black markets, and controllers. Our family home, I recall, remained half complete for years because my father was unwilling to bribe the cement controller for a few extra bags of cement. The mighty Soviet Union also collapsed partly because of political pricing.

Corruption is the inevitable result of tampering with prices. It has led to adulterating diesel with kerosene, a scam estimated at a shocking Rs 40,000 crore per year by KLN Shastri, formerly of the government’s Oil Coordinating Committee, plus the murder of whistleblowers who tried to expose the racket. In controlling food prices, the nation actually spends Rs 3.65 to deliver a rupee worth of grain through the PDS system — no wonder, half the grain ‘leaks’ out. In the case of power, theft is the natural outcome of price control. The Indian Railways actually loses 24 paisa per kilometre on every second-class ticket, which prevents it from from modernizing.

Modi must employ his considerable rhetorical skills to persuade Indians that an efficient, corruption-free economy does not allow politicians to set prices. It will also help him to convince people that direct cash transfers into Jan Dhan Yojana bank accounts is a more efficient, less corrupt way to deliver welfare. The market does a far better job of preventing corruption than even the Lokpal, a lesson that has escaped Arvind Kejriwal and Anna Hazare.

A few days after decontrolling diesel prices, the government announced competitive bidding in coal mining. It was a good decision as marketbased auctions are the right way to discover the price of natural resources. But it did not go far enough — it restricted open bidding only to users of coal, such as power companies. Had it opened coal mining for free sale, it would have brought much higher revenues to the state and led to a competitive coal market, breaking Coal India’s monopoly that is the root cause of the nation’s coal troubles. Allowing competition in airlines, telephones, and television has greatly increased choice and freedom in India. There is an irony here: Indians think they are free because of their proud democracy, but economically they are still quite unfree.

Modi has repeatedly said that the government’s job is not to run business but to govern. But such general statements will not help him to sell the tough decisions that are coming in the next few months. He needs to go the extra mile to persuade Indians that subsidies, price controls, and government monopolies create distortions and harm the very people they are meant to serve. Market competition keeps prices low, raises the quality of products, and increases the aam aadmi’s freedom. It is when politicians are allowed to make economic decisions that crony capitalism enters the system.

In the end, Prime Minister Modi will be judged for creating jobs, controlling inflation, and stopping corruption. All three of these happy outcomes depend on moving decisions that are still in the discretionary hands of politicians to the impersonal market. Like democracy, the market is imperfect but it is better than any other alternative. If Modi succeeds in changing the narrative, an aspiring India may finally shed its socialist hypocrisy and begin to trust the market.

Thursday, October 23, 2014

स्वच्छता की नींव पर राष्ट्र निर्माण

राष्ट्रीय स्वयंसेवक हमें यह याद दिलाने से कभी नहीं चूकता कि भारतीयों में राष्ट्रीय गौरव की भावना थोड़ी और होनी चाहिए। हालांकि, नरेंद्र मोदी ने नागरिक होने के गौरव को अधिक महत्वपूर्ण बताकर आरएसएस को ही नसीहत दे डाली है। सच में यह राष्ट्रवाद की अधिक मजबूत व टिकाऊ नींव है। नागरिकों को नागरिकता के मूल्य सिखाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान देश का सबसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। केजरीवाल के अस्थिर हाथों से झाड़ू छीनकर और कांग्रेस के आलिंगन से गांधी को छुड़ाकर मोदी ने देश के इतिहास में राष्ट्र की सफाई का सबसे बड़ा अभियान छेड़ा है।

नागरिकता बोध मानव में प्राकृतिक रूप से नहीं आता। इसे लगातार याद दिलाना जरूरी होता है तथा भारत से ज्यादा कहीं और इसकी जरूरत नहीं है, जो अब भी अपने यहां नागरिक निर्मित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

नागरिकता के ख्याल से प्रेरित नागरिक हमेशा पड़ोसियों के बारे में सोचता है फिर चाहे उनकी जाति या वंश कुछ भी क्यों न हो। ऐसे व्यक्ति को ‘लव जेहाद’ जैसे अभियानों से चोट पहुंचती है, जिसके कारण भाजपा ने उत्तरप्रदेश के हाल के उपचुनावों में 11 सीटों में से 8 सीटें खो दीं, जो उचित ही था। मोदी के आधुनिकीकरण के विचार और आरएसएस के बीच विभाजन पैदा हो रहा है। यह ठीक वैसा ही है, जैसा वाजपेयी व आरएसएस के बीच था। मैं शर्त लगा सकता हूं कि अंत में जीत प्रधानमंत्री की ही होगी।

आधुनिकीकरण की इस परियोजना में मोदी को टेक्नोलॉजी के कारण सफलता की उम्मीद है, जिसमें महात्मा गांधी और पूर्ववर्ती सरकारें विफल रहीं हैं। उन्हें लगता है कि देशभर में स्वच्छता, देशभर में वाई-फाई जैसी बात है। वे कहते हैं कि विकास सिर्फ वृद्धि दर की बात नहीं है पर साथ में वे लोगों के जीवन में गुणवत्ता लाने की बात भी करते हैं और साफ-सुथरा वातावरण इस दिशा में मददगार है। अब नगर पालिकाओं के सामने कम लागत वाली टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, लेकिन वे तब सफल होंगी जब हमारे नागरिक प्रयास करेंगे और इसीलिए हमारे प्रधानमंत्री लोगों का नज़रिया बदलने का प्रयास कर रहे हैं।

मोदी सिंगापुर के महान नेता ली कुआन यू का अनुसरण कर रहे हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि स्वच्छता के नैतिक मूल्य पर राष्ट्र निर्माण संभव है। हालांकि, यदि भारत को इस अभियान का शोर व जोर ठंडा होने के बाद भी स्वच्छ रहना है तो मोदी को भी वही करना होगा, जो सिंगापुर ने किया। उन्हें कचरा फैलाने के खिलाफ सख्त कानून बनाने होंगे। आरोग्य व लोक स्वास्थ्य पर सतत निवेश जरूरी होगा और यह पैसा सही जगह खर्च होगा।

यदि किसी एक शब्द से भारत के शहरों व कस्बों को वर्णित किया जाए तो वह शब्द है गंदगी। हममें से कई लोग यह सोचते हैं कि गरीबी व गंदगी का चोली-दामन का साथ है, लेकिन बात ऐसी नहीं है। कोई गरीब होकर भी साफ-सुथरा हो सकता है। भारत में सबसे गरीब घर में प्राय: सबसे स्वच्छ रसोईघर होते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान गरीब हो गया था, लेकिन इसके शहर अत्यधिक स्वच्छ थे। वास्तव में पूर्वी एशिया हमेशा से ही दक्षिण एशिया की तुलना में अधिक स्वच्छ रहा है। भारत में भी उत्तर की तुलना में दक्षिण भारतीय समुदाय अधिक स्वच्छ हैं (तब भी जब वे तुलनात्मक रूप से ज्यादा गरीब थे।)

महात्मा गांधी का भी विश्वास था कि नागरिक मूल्य और स्वच्छता राष्ट्रवाद की नींव हैं। लाहौर के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में वे पूर्ण स्वराज्य की बजाय कांग्रेस प्रतिनिधियों की गंदगी फैलाने की आदतों पर अंतहीन बोलते रहे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि उन्होंने स्वराज पर उत्तेजनापूर्ण भाषण क्यों नहीं दिया, तो उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता पाने के लिए व्यक्ति को इसके लायक बनना होता है और योग्य बनने के लिए भारतीयों को व्यक्तिगत अनुशासन और साफ-सफाई के मामले में सुधार लाना होगा। मोदी की तरह गांधी का भरोसा था कि नागरिक दायित्व और स्वच्छता राष्ट्रीय गौरव के आधार हैं। मोदी और गांधी में अंतर यह है कि मोदी हमारी दिन-प्रतिदिन की समस्याएं सुलझाने के लिए टेक्नोलॉजी की शक्ति में भरोसा करते हैं। उन्हें भरोसा है कि मेट्रो परिवहन व्यवस्था के साथ स्मार्ट शहर नए नागरिक मूल्य स्थापित करेंगे। मैं कभी-कभी दिल्ली की मेट्रो में सवार होता हूं और मैंने इसे हमेशा स्वच्छ, शांत और कुशल पाया। इसकी वजह से अचानक अजनबियों के बीच भी रिश्ता कायम हो जाता है। मैंने देखा कि लोगों में वह मैत्री व गरिमा पैदा हो गई, जो वे आमतौर पर अपने रिश्तेदारों व मित्रों के बीच दिखाते हैं। मैं ट्रेन में बैठे हर व्यक्ति से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता हूं। जैसे ही मैं ट्रेन से बाहर सड़क पर आता हूं, चारों ओर वहीं गंदगी पाता हूं। अचानक मैं खुद को अलग-थलग महसूस करने लगता हूं।

इससे ज्यादा सद्‌भावनापूर्ण, ज्यादा मानवीय कुछ नहीं हो सकता कि गहराई में हम यह महसूस करें कि हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हमें ऐसे अवसर निर्मित करने होंगे जहां लोग कंधे से कंधा भिड़ाकर काम करके एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और आदर पैदा कर सकें। मोदी की बात में दम है, क्योंकि दिल्ली मेट्रो ने बता दिया है कि आप शहर की संस्कृति बदल सकते हैं। परिवहन का नया साधन नागरिक क्रांति लाने का शक्तिशाली जरिया हो सकता है।

जब कई ज्वलंत समस्याएं सामने हों तो कचरे के बारे में शिकायत करना अजीब लग सकता है। हालांकि, ली कुआन यू ने दुनिया को बता दिया था कि स्वच्छता के मानक पर राष्ट्र निर्माण किया जा सकता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले सिंगापुर किसी भी भारतीय शहर जितना ही गंदा था, लेकिन आज यह धरती का सबसे स्वच्छ शहर है। सिंगापुर ने बड़ी संख्या में कूड़ादान रखवाए और बहुत सारे टॉयलेट का निर्माण करवाया। इसके साथ उन्होंने जुर्माने की कड़ी व्यवस्था उतनी ही शिद्‌दत से लागू करवाई। कोई भी भारतीय शहर यह कर सकता है। हमारे सुधारों का यही तो निचोड़ है : संस्थाओं की प्रोत्साहन व्यवस्था को लोकहित से जोड़ा गया तो शासक और शासित दोनों का व्यवहार सुधर सकता है। हमारे सार्वजनिक स्थल गंदे क्यों हैं? यह शिक्षा का काम है या यह सांस्कृतिक समस्या है? निश्चित ही अपनी निजी जगहों पर हम तुलनात्मक रूप से स्वच्छ होते हैं। हम रोज नहाते हैं, हमारे घर साफ होते हैं और किचन तो निश्चित ही चमचमाते होते हैं। हमारी राष्ट्रीय छवि ऐसे भारतीय परिवार की है, जो बड़े गर्व से अपना घर साफ करता है और फिर गंदगी दरवाजे के बाहर फेंक देता है। इसकी संभावना नहीं है कि मोदी देश को स्वच्छ करने को लेकर हमें शिक्षित करना छोड़ दें। यदि वे चाहते हैं कि हम हमारी बची हुई जिंदगी में रोज साफ-सफाई करें, तो उन्हें अपने अगले भाषण में यह कहना होगा : मेरे हमवतन देशवासियो, यदि हम अपना दायरा घर के दरवाजे से एक मीटर आगे बढ़ा दें और उस एक मीटर में कचरा फेंकने की बजाय हम उसे चकाचक साफ कर दें तथा सारा देश ऐसा करने लगे तो भारत स्वच्छ हो जाएगा। यह कोई हवा में किला बनाने वाली बात नहीं है। विदेशों में कुछ जगह लोग घर के बाहर के फुटपॉथ रोज धोकर स्वच्छ करते हैं। एक हजार मील की यात्रा, पहले मीटर से शुरू होती है।

Sunday, October 12, 2014

An idiot-proof and swachh guide to nationalism

Civic virtue seldom comes naturally to human beings. It needs constant, relentless reminding and nowhere more than in India, which is still struggling to create citizens out of its people. The word ‘civic’ comes from ancient Greece and is related to ‘city’ and ‘civility’. A ‘citizen’ lived in a city and a ‘civilized’ person was expected to show concern for his fellow citizens. In this kindly act ‘civilization’ was born. Those without civic virtue were called idiots in Greece, which is, indeed, the origin of the word ‘idiot’.

Swachh Bharat Abhiyan is India’s most ambitious programme to teach civic virtue to its citizens. Snatching the jhadoo from Arvind Kejriwal’s uneasy hands and Mahatma Gandhi from Congress’ anxious embrace, Narendra Modi has launched what is billed as the biggest drive in India’s history to clean the nation. He hopes to succeed in this modernizing project where the Mahatma and previous governments failed partly because of technology. In his mind, universal cleanliness is on par with universal Wi-Fi. Vikas is not only about growth rates, he says, but also about improving the quality of peoples’ lives — and clean spaces help to do that.

Frustrated by the lack of market reforms, liberals are realizing that Modi is a pragmatic modernizer, not a liberal reformer like Margaret Thatcher. He wants to transform India by changing attitudes and improving the functioning of the state — through better execution and efficient delivery of services. Without worrying about the colour of the cat (as long as it catches mice), he will reform pragmatically like Deng.

He is following Singapore’s modernizing Lee Kuan Yew, who proved that nations could be built upon an ethic of cleanliness. If India is to remain clean after the hype is over, Modi too will have to institute litter laws and deterrent fines. Cleanliness will also require relentless and persistent investments in sanitation and public health, and it will be money well spent.

Modi is lucky when it comes to vikas. While he has been circling the globe, inflation at home has been falling steadily, growth has begun to recover mildly, the trade deficit is declining, forex reserves are rising, the rupee is holding up, and thanks to the drop in oil prices and better returns expected from PSU disinvestments in a bullish stock market, it looks as though he will achieve his ambitious fiscal deficit target.

Hence, India’s credit rating has inched up, and it is now time for the RBI to cut interest rates. The RSS never fails to remind us that Indians ought to have more national pride. Modi is, however, turning the tables on the RSS by teaching that civic pride is more important. It is, in fact, a stronger, more durable foundation for nationalism. Indeed, a civic-minded citizenry is considerate of its neighbours no matter of which caste or creed. It will not tolerate campaigns like “love jihad“ which rightly lost the BJP eight out of 11 seats in Uttar Pradesh in the recent byelections. A divide is growing between the ideas of Modi and the RSS — similar to the one that grew between Atal Bihari Vajpayee and the RSS — and my bet is that the PM will prevail.

Modi is unlikely to stop tutoring us on cleaning India. By launching his campaign in Delhi’s Valmiki Colony, he realizes that India will have to negotiate the formidable reality of caste and the truth about who cleans India and who doesn’t. But smart cities will be his allies —Delhi’s Metro has shown that clean surroundings can help to create opportunities for rubbing shoulders with fellow citizens, and build empathy and respect for them. If he wants us to clean India every day for the rest of our lives, he ought to say this in his next speech: My fellow citizens, if only we would extend the circle of our concern by only one metre beyond the door or the gate of our home; if instead of throwing dirt over that alien one metre, we would absent-mindedly sweep it clean; and if all Indians did that, India would turn clean. This is not a pipe dream — in some cities abroad, citizens actually wash the footpath outside their home daily. A journey of a thousand miles begins with the first metre.

Monday, September 29, 2014

The $74m Mars mission benefits India every bit as much as clean water

Last week India sent a satellite into orbit around Mars,with a low-cost, nimble mission that has stunned the world. At $74m over three years, the cost was roughly one-ninth that of the latest (also successful) US mission, which took six years. And in reaching the red planet on its first attempt, India’s space agency succeeded where many other leading powers – including the US, Russia,China and Japan– failed.

To reach Mars, Mangalyaan (or “Mars craft” in Hindi) had initially to execute a complex slingshot trajectory, swinging around the Earth several times to generate speed using the planet’s gravity field. Once it arrived at its destination, its dormant systems and engines were awoken, programming delicate remote manoeuvres while the craft operated on battery power on the planet’s dark side. It was not the shoestring budget alone but also the quality of the pictures transmitted that excited scientists around the world.

Many argue the money would have been better spent on clean water and toilets in what remains in many places a desperately poor country,and they have a point. But in assuming that spending on space is a hobby of rich countries alone, they fail to realise that nation building entails the memory of heroic achievements such as this one, which will go on to inspire generations of children to pursue careers in pure and applied sciences.The value of this inspiration is incalculable in developing the sort of talent that can disproportionately benefit a nation.

The investment in the project was less than the $100m budget for the film Gravity, or even a Bollywood blockbuster. How did Indian scientists succeed so economically? It is not simply that people costs are lower, or that homemade technologies are cheaper than imports. It is because project managers focused on a few crucial objectives and executed them brilliantly. This is what impresses international scientists such as Britain’s Professor Andrew Coates, who will be a principal investigator on Europe’s 2018 Mars rover mission.

Mangalyaan will confine itself to measuring methane in the atmosphere, perhaps the most important research subject because it relates to the possibility of life on Mars. Western scientists are excited over the Indian probe, since it will dovetail nicely with US and European efforts. “It means we’ll be getting three-point measurements, which is tremendous,” says Prof Coates.

No one understands the modernising value of the Mars mission better than Narendra Modi, India’s prime minister. In a society beset by middle-class insecurities, science is increasingly neglected in favour of more practical careers in business, law and engineering. This is a valuable chance to revive its popularity. This mission reminded the nation of an earlier generation that had produced outstanding scientists, some of them Nobel Prize winners, who are remembered for world-famous contributions such as the Raman effect, the Saha equation and the Chandrasekhar Limit. As Mangalyaan entered the red planet’s orbit last week, Mr Modi urged every college and school to spend five minutes savouring the moment, just as they would a cricket victory.

The next day he launched his “Make in India”campaign, aimed at persuading companies to invest in the country and at bolstering its unsuccessful manufacturing industry. The satellite’s success was the result of a “can do” attitude, he said.

More of that approach is needed in a country that has performed below its potential,too often held back by red tape and corruption. The Mars mission has provided at least a temporary boost to the image of India’s public sector. It is reassuring to Mr Modi, who has disappointed liberals like me, frustrated by the lack of market reforms. We are beginning to realise that Mr Modi is a pragmatic, nationalist moderniser, not a liberal reformer such as former UK prime minister Margaret Thatcher. He plans to transform India by improving the functioning of the state–through better execution and efficient delivery of services. Like China’s Deng Xiaoping, he will reform pragmatically–without worrying about the colour of the cat, as long as it catches mice.

Wednesday, September 24, 2014

लव जेहाद नहीं, मॉडर्न मिशन जरूरी

हमारे सामने मजेदार दृश्य है। एक तरफ ‘मॉडर्न’ प्रधानमंत्री हैं, जो केवल विकास की बात करते हैं जबकि दूसरी ओर उनके सहयोगी वोट हासिल करने के लिए मतदाताओं में ‘अन-मॉडर्न’ धार्मिक आशंकाओं को हवा देते हैं। आधुनिकता के गुणों में धर्म और राज्य का पृथक अस्तित्व भी एक गुण है, जहां धर्म आधुनिक व्यक्ति के निजी जीवन तक सीमित होता है। नरेंद्र मोदी के आधुनिक विकासवादी एजेंडे को पटरी से कोई चीज उतार सकती है तो वह है आरएसएस जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों की ‘अन-मॉडर्न’ मानसिकता, जो अब भी सार्वजनिक जीवन में हिंदुत्व एजेंडा भरने में लगा है। उत्तरप्रदेश विधानसभा के उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को इससे होने वाले नुकसान का पहला संकेत मिला है, जिसमें पार्टी 11 सीटों में से 3 सीटें ही जीत सकी।

कई लोग मानते हैं कि भाजपा ने ‘लव जेहाद’ जैसी अजीब-सी बात फैलाकर आत्मघाती गोल कर लिया है। पार्टी के उत्तरप्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी इसे लेकर ज्यादा ही आगे बढ़ गए और जब तक नई दिल्ली का नेतृत्व उनकी खिंचाई करता, बहुत देर हो चुकी थी। ‘लव जेहाद’ और योगी आदित्यनाथ के अतिवादी बयानों ने राज्य का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया और समाजवादी पार्टी ने मुस्लिमों का संरक्षक बनकर इस स्थिति का फायदा उठा लिया। भाजपा यह भूल गई कि उसने उत्तरप्रदेश की 80 में से 71 लोकसभा सीटें अच्छे शासन और आर्थिक विकास के वादे पर जीती थीं, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर नहीं।

‘लव जेहाद’ यह जुमला भारतीय शब्दावली में 2009 में आया जब केरल व कर्नाटक में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की खबरें आईं। हिंदू राष्ट्रवादियों ने दावा किया कि मुस्लिम पुरुष फुसलाकर हिंदू लड़कियों से विवाह कर उनका धर्म बदल रहे हैं। इसके पीछे भारत को मुस्लिम बहुसंख्या वाला देश बनाने का दीर्घावधि लक्ष्य है। तब दो मुस्लिम युवकों को इस आरोप में जेल में डाल दिया गया था कि उन्होंने यूनिवर्सिटी की दो गैर-मुस्लिम छात्राओं को िववाह का वादा कर धर्मांतरण के इरादे से फांस लिया। अदालत में दोनों युवतियों ने मुस्लिम युवाओं के खिलाफ गवाही दी। एक युवती ने बताया कि वह कॉलेज में वरिष्ठ छात्र के प्रेम में पड़कर उसके साथ भाग गई थी। उन्हें विवाह अपेक्षित था, लेकिन इसकी बजाय मुस्लिम केंद्र ले जाया गया, जहां उनका इस्लामी अतिवादी प्रचार से सामना हुआ। केरल हाईकोर्ट ने पुलिस से इन शिकायतों की जांच करने को कहा। पुलिस जांच का निष्कर्ष यह था कि कुछ असामाजिक पुरुषों द्वारा ऐसी घटनाएं अंजाम देने की इक्का-दुक्का घटनाएं हुई हैं, लेकिन धर्मांतरण के उद्‌देश्य से व्यापक साजिश के कोई सबूत नहीं मिले।

उत्तरप्रदेश में भी पुलिस को पिछले तीन माह में मिली ‘लव जेहाद’ की छह में से पांच रिपोर्टों में बलपूर्वक धर्मांतरण या इसके प्रयास के कोई सबूत नहीं मिले। प्रदेश के पुलिस प्रमुख एएल बनर्जी ने बताया ‘ज्यादातर मामलों में हिंदू युवती व मुस्लिम युवक के बीच प्रेम था और उन्होंने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ विवाह किया था। ये लव मैरिज के मामले थे लव जेहाद के नहीं।’ मुझे तो लव जेहाद कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों की अति-सक्रिय और आत्म-विश्वासहीन कल्पना की उपज लगता है।

चूंकि मतदाता मूर्ख नहीं हैं, भाजपा को हाल के उपचुनाव में इसका खमियाजा भुगतना पड़ा। वास्तविक जोखिम तो यह है कि लव जेहाद जैसी मूर्खताएं मुस्लिमों को और अलगाव का अहसास कराएंगी और वे पाकिस्तान में बैठे अल कायदा के कमांडर अयमान अल-जवाहिरी और मध्यपूर्व के इस्लामिक स्टेट की अपीलों के शिकार बन सकते हैं। हमें तो संघ परिवार के काल्पनिक लव जेहाद की बजाय इन आतंकवादियों के लव-लैस जेहाद की ज्यादा चिंता करनी चाहिए।

लव जेहाद की फैंटेसी के पीछे पितृसत्तात्मक व्यवस्था का पुरातनपंथी विचार है, जिसमें महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति समझा जाता है और संपत्ति की रक्षा करना पुरुषों का दायित्व। ज्यादातर परंपरागत धर्मों में यह विचार पाया जाता है, लेकिन 21वीं सदी में महिलाओं के बारे में ऐसा सोचना उनका अपमान है। लव जेहाद के पीछे महिलाओं के बारे में यह नकारात्मक विचार है कि वह जिम्मेदार नहीं है, उसकी अपनी कोई सोच नहीं होती और इसीलिए उसे पुरुषों के संरक्षण की जरूरत है। यदि हमें आधी आबादी की कोई परवाह है तो हमें इस पुरुषवादी मानसिकता पर प्रहार करना चाहिए, जो महिला को अधीनता में रखना चाहती है। धर्मशास्त्रों के जरिये इस मानसिकता को हजारों वर्षों में खाद-पानी मिला है। मनु कहते हैं कि स्वभाव से ही महिलाएं चंचल, बुरी और इच्छाओं के वशीभूत होती हैं। ‘स्त्रीधर्मपद्धति’ के लेखक त्र्यंबक जोर देकर कहते हैं कि महिलाएं वफादार नहीं होतीं, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उन्हें लेकर सचेत रहना पड़ता है। किंतु शास्त्रों को इस बात का भी अहसास है कि महिला में मातृत्व के गुण हैं और परिवार बनाने व पुत्र होने के लिए वे आवश्यक हैं। इस प्रकार महिला के बेलगाम स्वभाव (स्त्रीभावना) और परिवार व समाज की आवश्यकताओं के बीच द्वंद्व है, इसलिए धर्मशास्त्रों ने ‘स्त्री-धर्म’ यानी परिवार व समाज के प्रति उसके कर्तव्य सिखाने और उनमें जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का फैसला किया। यह सीख देने की कोशिश की कि अविवाहित महिला का कर्तव्य है पवित्र बने रहना और विवाहित महिला को पति के प्रति वफादार रहना चाहिए।

इस मानसिकता का नतीजा यह होता है कि जिस दिन बेटी युवावस्था में पहुंचती है, परंपरागत भारतीय परिवार नैतिक संत्रास में पहुंच जाता है। उस दिन के बाद पालक धीमी आवाज में योग्य लड़का खोजने के बारे में बातें करते हैं ताकि उसकी शादी कर दी जाए। अपनी जाति का लड़का हो तो बेहतर। यदि वे ब्राह्मण हैं तो वे उसे वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर में पूजा के लिए ले जाते हैं ताकि उसे योग्य वर मिल सके। लड़कियां पालकों को खुश रखने के लिए सोमवार का व्रत रखने लगती हैं, लेकिन आयु बढ़ने के साथ वह कॉलेज जाती है और वहां उसे आकर्षक युवा दिखाई देते हैं। रोमांस फलता-फूलता है और प्राय: प्रेम विवाह हो जाते हैं। युवती खुद ही युवक के साथ भाग जाने का निर्णय तक ले सकती है।

देश को खतरा बाहर से नहीं, भीतर से है। भारतीय मुस्लिम दुनिया का सबसे कम कट्‌टर मुस्लिम है। यह भारत के लोकतंत्र और हिंदू धर्म की बहुलता का असर है। भारत का इस्लाम भी उतना कट्‌टर नहीं है और यह गुणवत्ता में सूफी जैसा है। आरएसएस और संघ परिवार हिंदू धर्म का इस्लामीकरण करने का प्रयास कर रहे हैं और इसे कट्‌टर बना रहे हैं। वे भारत को तकलीफ में फंसे पाकिस्तान में बदलना चाहते हैं। लव जेहाद और इस जैसी पागलपनभरी बातों से मुस्लिम असुरक्षित महसूस करने लगेगा और अयमान अल-जवाहिरी और आईएसआईएस के बहकावे में उसके आने की आशंका बढ़ेगी। मोदी की जिम्मेदारी है कि वे इस भटकाव को रोकें ताकि वे चुने जाने के बाद किए अपने तीन वादे पूरे कर सकें- रोजगार पैदा करना, महंगाई पर लगाम लगाना और भ्रष्टाचार रोकना। लोगों ने भाजपा को विकास और सुशासन के लिए चुना है, लव जेहाद में पड़ने के लिए नहीं।

Saturday, September 13, 2014

मजबूत नेतृत्व का असर

आम जनता की अपेक्षाओं के लिहाज से मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल पर निगाह डाल रहे हैं गुरचरण दास
भारत के लोगों ने नरेंद्र मोदी का चुनाव बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन करने, बेहतर शासन देने और महंगाई पर लगाम लगाने के लिए किया। अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि वह इन तीनों ही वादों को पूरा कर सकेंगे। उनके कार्यकाल के शुरुआती तीन-साढ़े तीन माह यही दर्शाते हैं कि वह किस तरह इन लक्ष्यों को पूरा करना चाहते हैं। लोगों की अपेक्षाओं को देखते हुए सरकार को बहुत सजग रहना होगा। आज की तिथि तक मोदी का उल्लेखनीय योगदान यही है कि सरकार में सभी स्तरों पर कार्यो के निपटारे में चमत्कारिक सुधार आया है। कांग्रेस शिकायत कर रही है कि मोदी सरकार के पास नए विचारों का अभाव है और वह संप्रग सरकार के विचारों की नकल कर रही है। हालांकि सच्चाई यही है कि विचार किसी के भी पास हो सकते हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कुछ लोग ही कर सकते हैं।
जो लोग मोदी सरकार द्वारा बड़े सुधार न किए जाने से निराश हैं वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या विचारों, नीतियों और कानूनों का अभाव नहीं, बल्कि इनका खराब क्रियान्वयन है। क्रियान्वयन में कमजोरी ही वह मुख्य कारण जिससे भारत की विकास दर पिछले तीन वर्षो में गिरती गई। पहले दिन से ही मोदी ने अपेक्षाओं को काफी ऊंचा रखा। उन्होंने सुरक्षित रास्ते का अनुसरण करने से इन्कार किया और इस वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण पाने का ऊंचा लक्ष्य तय किया और कहा कि वह इसे हासिल कर सकते हैं। वह निर्धारित लक्ष्य हासिल कर पाएंगे, इसमें संदेह है, लेकिन उद्देश्य को लेकर एक नई सोच आई है तथा केंद्र समेत तमाम राज्यों और यहां तक कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के रुख में स्पष्ट बदलाव परिलक्षित होने लगा है। इसका प्रमाण प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप अथवा परियोजना निगरानी समूह के गठन से लगाया जा सकता है, जो सैकड़ों की संख्या में रुकी पड़ी परियोजनाओं के अवरोधों को हटाने का प्रयास करेगा। इससे केंद्रीय मंत्रालयों के अधिकारी, राज्य सरकारें और बिजनेस वर्ग भी काफी उत्साहित है। हालांकि इसका गठन पहले ही हो गया था, लेकिन इस समूह को ऊर्जा तब मिली जब मोदी सत्ता में आए। ऐसी रिपोर्ट हैं कि पिछली सरकार में जो अधिकारी परियोजनाओं को रोकने में बाधक बन रहे थे और उदासीन रवैया अपनाए हुए थे अब वही अधिकारी जोशपूर्वक इन्हें आगे बढ़ा रहे हैं और लंबित परियोजनाओं को स्वीकृति दे रहे हैं।
अब चुनौतियां और बाधाएं खत्म हो रही हैं। एक समय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं वर्षो तक रुकी रहने के कारण उद्यमी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए थे और बैंकों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ता था। स्थिति कुछ ऐसी थी कि पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद भी बैंक वित्तीय मदद देने से इन्कार कर देते थे। नए भूमि अधिग्रहण कानून ने भी तमाम मुश्किलों को खड़ा करने का काम किया। तमाम राज्यों ने जानकारी दी कि नया कानून अस्तित्व में आने के बाद सभी तरह की भूमि की खरीद-बिक्री का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जब आप सैकड़ों की संख्या में रुकी परियोजनाओं के संदर्भ में इस समस्या का आकलन करते हैं तो आप सोचने को विवश होंगे और संप्रग सरकार की घटिया विरासत को लेकर देश की दुर्दशा पर रोएंगे या दुखी होंगे। इस मामले में हमें एक नई सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करने वाली मोदी सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हाथ खड़े करने के बजाय अधिकारियों को उत्तर खोजने के लिए प्रेरित किया और नतीजा यह हुआ कि सब कुछ चलता है की प्रवृत्ति वाले नौकरशाह अब उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। मोदी द्वारा हाथ में ली गईं महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एकल खिड़की का प्रावधान बड़ा बदलाव लाने में सहायक होगा। भारत में कोई उद्योग शुरू करने के लिए तकरीबन 60 क्लीयरेंस लेने की जरूरत पड़ती है, इनमें से 25 केंद्र के स्तर पर और 35 राज्य स्तर पर होती हैं, लेकिन डिजिटलीकरण के बाद यह सारे काम एक ही परियोजना निगरानी समूह द्वारा संभव होंगे। पूर्ण डिजिटलीकरण के बाद उद्यमी इसके लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे और अपने काम की प्रगति की जानकारी इंटरनेट पर देख सकेंगे। इससे यह भी पता चलेगा कि कौन अधिकारी फाइलों को रोक रहा है। इस तरह उद्यमियों के लिए एकल खिड़की का सपना साकार हो सकेगा। तीव्र क्रियान्वयन से रोजगार सृजन भी तेज होगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में नियुक्तियों में 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई है जो पिछले पांच वर्षो में बेहतरीन प्रदर्शन है।
मोदी भाग्यशाली रहे कि अप्रैल से जून तिमाही में जीडीपी विकास दर बेहतर रही। यह अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी और उच्च विकास को दर्शाती है। स्पष्ट है कि रोजगार का अधिक सृजन होगा। मोदी को तेज क्रियान्वयन के खतरे के प्रति भी सजग रहना होगा। जन-धन योजना एक बेहतरीन कार्यक्रम है, जिससे सभी भारतीयों को बैंक खाते की सुविधा मिलेगी और निर्धन वर्ग से संबंधित योजनाओं के लिए नकदी हस्तांतरण के माध्यम से बड़ी मात्रा में सरकारी धन की बचत होगी। हालांकि यह योजना बैंकों पर अत्यधिक निर्भर है, जो गरीबों का खाता खोलने के लिए बहुत इच्छुक नहीं हैं। बैंक तभी रुचि लेंगे जब सब्सिडी की वर्तमान व्यवस्था को खत्म किया जाए और धन का प्रवाह गरीबों के लिए खुले इन खातों में किया जाए। इसमें समय लगेगा।
जहां तक मोदी की ओर से शासन में सुधार, क्लीयरेंस में पारदर्शिता के माध्यम से जवाबदेही के वादे की बात है तो निश्चित रूप से इससे लालफीताशाही खत्म होगी। सिंगापुर, अमेरिका जैसे तमाम देशों में बिजनेस शुरू करने में 3 से 5 दिन लगता है, जबकि भारत में 75 से 90 दिन। इसी कारण बिजनेस रैंकिंग रिपोर्ट में भारत का स्थान 134वां है। तीसरा मुद्दा महंगाई पर नियंत्रण का है। मोदी सरकार अतिरिक्त पड़े भंडारों से खाद्यान्नों को बेच रही है जिससे इनके दाम गिरे हैं, लेकिन यदि आयात शुल्क घटाए जाते हैं और महत्वपूर्ण खाद्यान्नों व सब्जियों आदि पर से गैर टैरिफ बाधाओं को खत्म किया जाता है तो वह इस तीसरे लक्ष्य को भी हासिल कर सकेंगे। पेट्रोलियम पदार्थो के दाम कम हुए हैं और मानसून का बहुत खराब न रहना मोदी के लिए लाभदायक है। यदि वह सरकारी खर्चो में कटौती कर सके तो महंगाई और कम होगी। ध्यान रहे संप्रग सरकार में सरकारी खर्च महंगाई बढ़ने की एक मुख्य वजह थी।
मोदी कार्यकाल के तीन महीने बताते हैं कि कैसे एक प्रभावी नेतृत्व बेहतर क्रियान्वयन के माध्यम से सरकार की क्षमता को बढ़ा देता है। कम महंगाई के साथ उच्च विकास को बनाए रखने के लिए मोदी को दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों पर अमल करना होगा। भ्रष्टाचार पर प्रहार करने और बेहतर शासन के लिए उन्हें नौकरशाही, पुलिस और न्यायपालिका में सुधार करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात, मोदी को केसरिया ब्रिगेड पर नियंत्रण करना होगा, जो उनके तीन वादों को पूरा करने में अनावश्यक अड़चन पैदा कर सकती है।